मुख्यपृष्ठसमाज-संस्कृतिचीनी ‘स्मार्ट’ होनी चाहिए और मीठी नहीं...सीएसआईआर-सीएफटीआरआई निदेशक का भारतीय खाद्य उद्योग...

चीनी ‘स्मार्ट’ होनी चाहिए और मीठी नहीं…सीएसआईआर-सीएफटीआरआई निदेशक का भारतीय खाद्य उद्योग को आह्वान

-खाद्य वैज्ञानिक, नियामक अधिकारी, उद्यमी और उद्योग प्रतिनिधि ‘चीनी कम 2026’ सम्मेलन में एकजुट

-अन्न में चीनी कम करते हुए स्वाद और गुणवत्ता कैसे बनाए रखें, इस पर दिनभर मंथन

सामना संवाददाता / मुंबई

भारत में हर साल लाखों नागरिक मधुमेह और मोटापे की गिरफ्त में आ रहे हैं। ऐसे में चीनी में कमी का विषय अब केवल आहार विशेषज्ञों की सलाह तक सीमित नहीं रहा। यह एक बहुआयामी वैज्ञानिक, तकनीकी, नियामक और व्यावसायिक प्रश्न बन चुका है और इसका ठोस, समन्वित उत्तर खोजने के लिए देश के खाद्य वैज्ञानिक, नियामक संस्थाएं और उद्योग जगत मुंबई में एकत्र हुए।
एसोसिएशन ऑफ फूड साइंटिस्ट्स एंड टेक्नोलॉजिस्ट्स इंडिया (AFST(I)) मुंबई चैप्टर ने सीएसआईआर-केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान (CSIR-CFTRI) के सहयोग से बुधवार को मुंबई के सीप्ज़ स्थित भारत रत्नम सभागार में ‘चीनी कम 2026 खाद्य पदार्थों में चीनी कम करने पर हितधारक सम्मेलन’ का आयोजन किया। खाद्य एवं पेय निर्माण में चीनी कम करने के तकनीकी दृष्टिकोण विषयक इस एकदिवसीय सम्मेलन में वरिष्ठ वैज्ञानिकों, नियामक अधिकारियों, बहुराष्ट्रीय खाद्य कंपनियों और स्वास्थ्यप्रद खाद्य स्टार्टअप्स ने हिस्सा लिया। स्वाद, बनावट और व्यावसायिक व्यवहार्यता से समझौता किए बिना भारत की खाद्य आपूर्ति में चीनी को कम करने का व्यावहारिक रोडमैप तैयार करना इस सम्मेलन का मूल उद्देश्य था।
सम्मेलन का उद्घाटन AFST(I) के मानद उपाध्यक्ष डॉ. उमेश कांबले, मानद सचिव डॉ. तनाजी कुद्रे, तत्काल पूर्व अध्यक्ष डॉ. आशुतोष इनामदार, इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी (ICT) के खाद्य अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी विभाग के प्रमुख तथा AFST(I) के पूर्व अध्यक्ष डॉ. यू. एस. अण्णापुरे और FSSAI के संयुक्त निदेशक डॉ. के. यू. मेथेकर की उपस्थिति में हुआ। उद्घाटन सत्र में सभी गणमान्यों के हाथों AFST(I) मुंबई चैप्टर की न्यूज़लेटर का विमोचन भी किया गया।
जागरूकता से कार्रवाई की ओर
मुख्य अतिथि के रूप में मुख्य भाषण देते हुए सीएसआईआर-सीएफटीआरआई के निदेशक डॉ. गिरिधर पर्वतम ने दिन का स्वर स्पष्ट शब्दों में निर्धारित किया- -भारत को अब चीनी के प्रति जागरूकता से आगे बढ़कर ठोस कार्रवाई की ओर जाना होगा।
“चीनी में कमी अब केवल पोषण की समस्या नहीं रही। यह एक वैज्ञानिक, तकनीकी, नियामक और व्यावसायिक चुनौती बन चुकी है, जिसके लिए समन्वित प्रतिक्रिया अनिवार्य है,” डॉ. पर्वतम ने कहा। उन्होंने रेखांकित किया कि अत्यधिक चीनी सेवन अब मोटापे, मधुमेह और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों से सीधे जुड़ा एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है-एक ऐसा बोझ, जिसे भारत वहन करने की स्थिति में नहीं है।
साथ ही, डॉ. पर्वतम ने सरलीकृत समाधानों के प्रति सावधान किया। उद्देश्य चीनी को पूरी तरह समाप्त करना नहीं, बल्कि विज्ञान-आधारित पुनर्निर्माण के ज़रिए खाद्य पदार्थों को वास्तविक रूप से स्वस्थ बनाना है और साथ ही खाद्य सुरक्षा, कार्यक्षमता, बनावट, शेल्फ लाइफ और उपभोक्ता अनुभव को पूरी तरह बनाए रखना है। “भविष्य उन खाद्य पदार्थों का है, जो अधिक स्वस्थ हों, वैज्ञानिक रूप से तैयार हों और व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य हों,” उन्होंने कहा। उद्योग, नियामक संस्थाओं और अनुसंधान संस्थानों को मिलकर व्यावहारिक और विस्तार योग्य समाधान विकसित करने का आह्वान भी उन्होंने किया। प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में अत्यधिक नमक की समस्या पर भी समान वैज्ञानिक गंभीरता के साथ ध्यान देने की आवश्यकता है, यह भी उन्होंने स्पष्ट किया।
सीएक्सओ परिचर्चा: उद्योग जगत का मंथन
मुख्य भाषण के बाद AFST(I) मुंबई चैप्टर के अध्यक्ष रितेश माथुर के संचालन में सीएक्सओ परिचर्चा हुई। इसमें मितुल शाह (स्टेविया टेक), महेंद्र एम. बर्वे (आईटीसी लिमिटेड), शशांक मेहता (द होल ट्रुथ फूड्स), संजीव कुमार शर्मा (कार्गिल), यश गावडे (कैंडर फूड्स) और डॉ. आशुतोष इनामदार ने भाग लिया। खाद्य पदार्थों में चीनी कम करते हुए उपभोक्ता अपेक्षाओं, उत्पाद प्रदर्शन और व्यावसायिक वास्तविकताओं के बीच संतुलन कैसे बनाए रखा जाए, इस पर चर्चा केंद्रित रही।
पैनलिस्टों ने सहमति जताई कि उपभोक्ता स्वीकृति ही किसी भी चीनी कम करने की रणनीति का सबसे निर्णायक पहलू है और बाज़ार की समझ के बिना की गई उत्पाद पुनर्रचना बड़े पैमाने पर सफल नहीं हो सकती।
नियामक दृष्टिकोण : व्यावहारिक ढांचा
सनोफी के डॉ. गौरव अग्निहोत्री के संचालन में हुए पहले तकनीकी सत्र में चीनी कम करने के नियामक परिदृश्य की विस्तृत समीक्षा की गई। केनव्यू के श्री विकास तलवार ने प्रमुख वक्तव्य दिया। FSSAI के डॉ. के. यू. मेथेकर, ICT मुंबई की डॉ. ज्योति सागर सोनटक्के-गोखले, डॉ. रेड्डीज़ लेबोरेटरीज की सुखदा भट्टे और AFST(I) मुंबई की पूर्व अध्यक्षा सुभाप्रदा निश्ताला ने चीनी लेबलिंग, अनुमत वैकल्पिक स्वीटनर और पोषण संबंधी अग्रिम घोषणाओं पर विस्तृत चर्चा की।
घटक नवाचार : कमी की नींव
AFST(I) मुंबई चैप्टर के मानद कोषाध्यक्ष श्री महेंद्र इंगले के संचालन में दूसरे तकनीकी सत्र में खाद्य निर्माताओं के लिए उपलब्ध घटक समाधानों की गहन चर्चा हुई। गिव्हॉडन इंटरनेशनल, इंग्रेडिऑन इन्कॉर्पोरेटेड, रिवेलेशंस बायोटेक, रेडा केमिकल्स इंडिया और पावक फूड प्रोडक्ट्स ने प्राकृतिक और कार्यात्मक स्वीटनर प्रणाली, फ्लेवर मॉड्युलेशन तकनीक और चीनी का संवेदी अनुभव बनाए रखने वाले घटक संयोजनों पर अपने विचार प्रस्तुत किए-यह वैश्विक खाद्य विज्ञान की अग्रिम पंक्ति में खड़ी एक महत्वपूर्ण चुनौती है।
इस सत्र में श्री पंकज शर्मा (इंग्रेडिऑन इन्कॉर्पोरेटेड), श्री जीवन लाखवाल (रेडा केमिकल्स इंडिया) और श्री कौशल डोंगरे (पावक फूड्स) ने अगली पीढ़ी के मिठास समाधानों के पीछे के विज्ञान को विस्तार से समझाया।
दोपहर के भोजन के बाद शामरॉक न्यूट्रासाइंसेज प्रा. लि. की सुश्री नाज़नीन हुसैन ने विशेष प्रस्तुति दी कि डिजिटल पोषण प्लेटफॉर्म भारत के ‘चीनी कम’ आंदोलन को किस प्रकार गति दे सकते हैं। वैज्ञानिक पुनर्निर्माण और रोज़मर्रा की आहार आदतों के बीच की खाई को डेटा-आधारित उपभोक्ता संवाद साधनों से कैसे पाटा जा सकता है, यह उन्होंने विस्तार से समझाया।
फॉर्मुलेशन विज्ञान : सटीकता की चुनौती
AFST(I) के पूर्व अध्यक्ष डॉ. प्रबोध हल्दे के संचालन में तीसरे तकनीकी सत्र में ज़ाइडस लाइफसाइंसेज की डॉ. विनीता सिंह ने प्रमुख वक्तव्य दिया। FSSAI पश्चिम क्षेत्र, इंग्रेडिऑन, मैरिको और डानोन, जो सामूहिक रूप से करोड़ों भारतीय उपभोक्ताओं तक पहुंचते हैं। के प्रतिनिधियों ने इस विषय पर गहन चर्चा की कि चीनी में कमी से उत्पाद की संरचना, नमी और संवेदी मानकों पर किस प्रकार प्रभाव पड़ता है।
इस पैनल में डॉ. वैदेही काळझुणकर (FSSAI पश्चिम क्षेत्र), श्री हिमांशू चौधरी (इंग्रेडिऑन इन्कॉर्पोरेटेड) और श्री मनोज पारीख (डानोन) ने यह समझाया कि वैज्ञानिक नवाचार को व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य, बाज़ार के लिए तैयार उत्पादों में कैसे रूपांतरित किया जाए, बिना उपभोक्ता अपेक्षाओं से समझौता किए।
स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र : नई पीढ़ी की अगुवाई
CASMB (चेंबर फॉर एडवांसमेंट ऑफ स्मॉल एंड मीडियम बिजनेसेज) के अध्यक्ष तथा AFST(I) मुंबई चैप्टर के पूर्व अध्यक्ष श्री नीलेश लेले के संचालन में चौथे तकनीकी सत्र में स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र पर विशेष ध्यान दिया गया।
स्टेविया टेक, द होल ट्रुथ फूड्स, अलोहा, नोटो आइस क्रीम, लाइव प्रवा और मेपल के प्रतिनिधियों ने साझा किया कि उभरते ब्रांड पारदर्शिता, नवाचार और विज्ञान-समर्थित निर्माण के ज़रिए स्वस्थ, कम चीनी वाले उत्पादों की उपभोक्ता मांग किस प्रकार तेज़ी से बढ़ा रहे हैं। पैनल में श्री मितुल शाह (स्टेविया टेक), श्री श्रीराम जी. (द होल ट्रुथ फूड्स), श्री जसमीत खन्ना (अलोहा), श्री वरुण शेठ (नोटो हेल्दी आइस क्रीम) और श्री निमित देढ़िया (मेपल) ने बताया कि स्टार्टअप्स किस प्रकार कई स्थापित बाज़ार खिलाड़ियों की तुलना में तेज़ी से उपभोक्ता अपेक्षाओं को नया आकार दे रहे हैं।
एक आंदोलन का आकार
सम्मेलन में बार-बार उभरा एक महत्वपूर्ण विचार यह था कि चीनी में कमी को अब केवल अनुसंधान एवं विकास की चुनौती के रूप में नहीं देखा जा सकता। विशेषज्ञों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सार्थक प्रगति के लिए नियामक ढांचे, घटक नवाचार, फॉर्मुलेशन विज्ञान, उपभोक्ता शिक्षण और उद्यमशीलता नेतृत्व -इन सभी का एक साथ समन्वय अनिवार्य है।
‘चीनी कम 2026’ ने अपनी व्यापकता और भागीदारी की गहराई से यह साबित कर दिया कि भारत का चीनी कम करने का आंदोलन अब एक सार्वजनिक स्वास्थ्य नारे से कहीं आगे निकल चुका है। खाद्य विज्ञान, नियामक नीति, घटक नवाचार और उद्यमशीलता की ऊर्जा एक साझा लक्ष्य के इर्द-गिर्द एकजुट हो रही है-करोड़ों उपभोक्ताओं के लिए स्वस्थ खाद्य विकल्पों को सुलभ, किफायती और वास्तव में आकर्षक बनाना।
जैसा कि डॉ. पर्वतम ने अपने मुख्य भाषण में कहा, उपभोक्ता शिक्षण प्रयोगशाला नवाचार जितना ही महत्वपूर्ण है। अकेले कोई भी एक पहलू पर्याप्त नहीं होगा। ‘चीनी कम’ को महज एक नारे से एक मापनीय राष्ट्रीय परिणाम बनाने का रास्ता-सभागार के भीतर और बाहर-हर हितधारक की निरंतर सक्रिय भागीदारी से ही निकलेगा।
यह सम्मेलन AFST(I) मुंबई चैप्टर द्वारा सीएसआईआर-सीएफटीआरआई के सहयोग से आयोजित किया गया था। AFST(I) का मुख्यालय मैसूरु में स्थित है और यह भारत की अग्रणी खाद्य वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीविद् पेशेवर संस्था है।

अन्य समाचार

सीप