मुख्यपृष्ठधर्म विशेषकुबड़ी ने लगाई आग...श्री राम को हुआ वनवास

कुबड़ी ने लगाई आग…श्री राम को हुआ वनवास

शीतल अवस्थी

एक दिन राजा दशरथ ने श्री रामचंद्रजी से कहा, ‘रघुनंदन! तुम्हारे गुणों पर अनुरक्त हो प्रजाजनों ने मन-ही-मन तुम्हें राज-सिंहासन पर अभिषिक्त कर दिया है- प्रजा की यह हार्दिक इच्छा है कि तुम युवराज बनो; अत: कल प्रात: काल मैं तुम्हें युवराज पद प्रदान कर दूंगा।’ राजा के आठ मंत्रियों तथा वसिष्ठजी ने भी उनकी इस बात का अनुमोदन किया। उन आठ मंत्रियों के नाम इस प्रकार हैं- दृष्टि, जयंत, विजय, सिद्धार्थ, राज्यवर्धन, अशोक, धर्मपाल तथा सुमंत्र। इनके अतिरिक्त वसिष्ठजी भी (मंत्रणा देते थे)। पिता और मंत्रियों की बातें सुनकर श्री रघुनाथजी ने ‘तथास्तु’ कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की और माता कौशल्या को यह शुभ समाचार बताकर देवताओं की पूजा करके वे संयम में स्थित हो गए।
उधर, महाराज दशरथ कैकेयी के भवन में चले गए। कैकेयी के मंथरा नामक एक कुबड़ी दासी थी, जो बड़ी दुष्टा थी। उसने श्री रामचंद्रजी के राज्याभिषेक की बात जानकर रानी कैकेयी से सारा हाल कह सुनाया। वह श्री रामचंद्रजी से वैर रखती थी और सदा यही चाहती थी कि राम को वनवास हो जाए। मंथरा बोली, ‘कैकेयी! तुम उठो, राम का राज्याभिषेक होने जा रहा है। यह तुम्हारे पुत्र और तुम्हारे लिए मृत्यु के समान भयंकर वृत्तांत है।’ उसकी बात सुनकर रानी कैकेयी को प्रसन्नता हुई। उन्होंने कुब्जा को एक आभूषण उतार कर दिया और कहा, ‘मेरे लिए तो जैसे राम हैं, वैसे ही मेरे पुत्र भरत भी हैं।’ तब मंथरा ने उस हार को फेंक दिया और कुपित होकर कैकेयी से कहा, ‘ओ नादान! तू भरत को, अपने को और मुझे भी राम से बचा। कल राम राजा होंगे, फिर राम के पुत्रों को राज्य मिलेगा। कैकेयी! अब राजवंश भरत से दूर हो जाएगा।’ फिर वह बोली, ‘मैं भरत को राज्य दिलाने का एक उपाय बताती हूं। पहले की बात है। देवासुर-संग्राम में शम्बरासुर ने देवताओं को मार भगाया था। तेरे स्वामी भी उस युद्ध में गए थे। उस समय तूने अपनी विद्या से रात में स्वामी की रक्षा की थी। इसके लिए महाराज ने तुझे दो वर देने की प्रतिज्ञा की थीं, इस समय उन्हीं दोनों वरों को उनसे मांग। एक वर के द्वारा राम का चौदह वर्षों के लिए वनवास और दूसरे के द्वारा भरत का युवराज-पद पर अभिषेक मांग ले।’ इस प्रकार मंथरा के प्रोत्साहन देने पर कैकेयी अनर्थ में ही अर्थ की सिद्धि देखने लगी और बोली, ‘कुब्जे! तूने बड़ा अच्छा उपाय बताया है।’ ऐसा कहकर वह कोपभवन में चली गई।
जब महाराज दशरथ कैकेयी के भवन में आए तो उसे रोष में भरी हुई देख राजा ने पूछा, ‘सुंदरी! तुम्हारी ऐसी दशा क्यों हो रही है? बताओ, क्या चाहती हो? जिन श्रीराम के बिना मैं क्षण भर भी जीवित नहीं रह सकता, उन्हीं की शपथ खाकर कहता हूं, तुम्हारा मनोरथ अवश्य पूर्ण करूंगा। कैकेयी बोली, ‘राजन, यदि आप मुझे कुछ देना चाहते हों, तो अपने सत्य की रक्षा के लिए पहले के दिए हुए दो वरदान देने की कृपा करें। मैं चाहती हूं, राम चौदह वर्षों तक संयमपूर्वक वन में निवास करें और आज ही भरत का युवराज पद पर अभिषेक हो जाए। अन्यथा, मैं विष पीकर मर जाऊंगी।’ यह सुनकर राजा दशरथ पर मानो व्रजपात ही हो गया। वे मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े। होश आने पर वे बोले, ‘पाप पूर्ण विचार रखने वाली कैकेयी! तू समस्त संसार का अप्रिय करने वाली है। तू मेरी स्त्री नहीं, कालरात्रि है। मेरा पुत्र भरत ऐसा नहीं है। पापिनी! मेरे पुत्र के चले जाने पर जब मैं मर जाऊंगा तो तू विधवा होकर राज्य करना।’ राजा दशरथ सत्य के बंधन में बंधे थे। उन्होंने श्री रामचंद्रजी को बुलाकर कहा, ‘बेटा! कैकेयी ने मुझे ठग लिया। तुम मुझे कैद करके राज्य को अपने अधिकार में कर लो, अन्यथा तुम्हें वन में निवास करना होगा और कैकेयी का पुत्र भरत राजा बनेगा।’ श्री रामचंद्रजी ने पिता और कैकेयी को प्रणाम करके उनकी प्रदक्षिणा की और कौशल्या के चरणों में मस्तक झुकाकर उन्हें सांत्वना दी, फिर लक्ष्मण और पत्नी सीता को साथ ले, ब्राह्मणों, दीनों और अनाथों को दान देकर, सुमंत्र सहित रथ पर बैठकर वे नगर से बाहर निकल वन की ओर चल पड़े।

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