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आस-पास बनारस कर लूं …!

बंदिशें तमाम आईं
नौजवानी की दहलीज पर ही प्यारे,
जानते हो तुम भी बेहद करीब से,
फिर चाहते क्यों हो?
कि सुर-लय-ताल अपना
मैं सबसे सरस कर लूं
जब आनंद आता है उन्हें!
पथरीली पगडंडियों पर ही प्यारे
फिर मुझे क्या पड़ी है, बताओ?
कि उनके लिए मेहनत करके
राह सारी मैं चौरस कर लूं
किसी कोने में चेहरा छुपा के
बैठे हैं जब लोग यहां के सारे
फिर आप ही बताओ प्यारे कि मैं..!
उनसे कैसे कोई बतरस कर लूं?
गुरबत में ही जीना है!
यहां जब मुझको प्यारे
फिर किस बात के लिए
मैं खुद को उनके परवश कर लूं
गहराइयां जो बख्शी हैं!
विधाता ने समंदर सी मुझको
फिर अनायास ही क्यों?
मैं खुद को पर्वत कर लूं
राह ढूंढ़नी है जब खुद ही!
यहां जमाने में मुझको प्यारे
फिर कदम-कदम पर!
खुद को क्यों मैं विवश कर लूं….
मन-मस्तिष्क दोनों ही!
कहते हैं अक्सर ही प्यारे कि
ढल जाओ जमाने के संग तुम भी
और अपनी बोली!
अब थोड़ी सी कर्कश कर लो
बुद्धि भी अपनी कुटिल होकर!
कहती है अक्सर यही कि
इस छछंदी दुनिया में!
अपना स्वभाव एकरस कर लो
जब हर ओर मिल रहे हैं!
सिरफिरे ही यहां पर….
फिर बेहतर यही है कि….!
जो मिले प्यार से यहां
उनको अंकवार में भरकर अपने!
अनायास ही आस-पास अपने
मैं बनारस कर लूं!!
-जितेंद्र कुमार दुबे
-अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ

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