मुख्यपृष्ठस्तंभराम मंदिर चढ़ावा प्रकरण हर दिन नया खुलासा

राम मंदिर चढ़ावा प्रकरण हर दिन नया खुलासा

-आरोपियों से आगे ट्रस्ट की जवाबदेही तक पहुंची जांच

-दान पेटी से बैंक तक पूरी प्रक्रिया का फोरेंसिक ऑडिट, सोने-चांदी और आभूषणों का भौतिक सत्यापन, कर्मचारियों की नियुक्ति में रिश्तेदारी की जांच और जिम्मेदार पदाधिकारियों की भूमिका का निष्पक्ष परीक्षण आवश्यक है। आस्था की रक्षा नारों से नहीं, पारदर्शिता और जवाबदेही से होगी।

राम मंदिर में श्रद्धालुओं के चढ़ावे की कथित चोरी का मामला अब केवल गणना कार्य से जुड़े आठ कर्मचारियों तक सीमित नहीं रह गया है। आरोपियों के घरों पर छापेमारी, नकदी और संपत्ति संबंधी दस्तावेजों की बरामदगी, बैंक कर्मचारियों की भूमिका की जांच तथा ट्रस्ट पदाधिकारियों से पूछताछ के बाद यह प्रकरण पूरी दान प्रबंधन व्यवस्था की जवाबदेही तक पहुंच गया है।
पुलिस अब तक आठ आरोपियों को गिरफ्तार कर लगभग ७९.८५ लाख रुपए बरामद करने की बात कह चुकी है। रविवार को आरोपियों के घरों की दोबारा तलाशी लेकर जेवरात, बैंक दस्तावेज, पहचान पत्र और संपत्ति से जुड़े कागजात जब्त किए गए। आरोपी लवकुश की पत्नी के नाम वर्ष २०२५ में खरीदी गई जमीन और उस पर बन रहे दो मकानों की भी जांच किए जाने की खबर है। पुलिस यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि इन संपत्तियों और चढ़ावे की कथित चोरी के बीच कोई आर्थिक संबंध है या नहीं।
जांच का एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि मंदिर में दान पेटियों से नकदी निकालने, गिनती करने और उसे बैंक तक पहुंचाने की प्रक्रिया पर वास्तविक नियंत्रण किसका था। जांच एजेंसियां कथित मुख्य साजिशकर्ताओं के साथ उन बैंक अधिकारियों की भूमिका भी देख रही हैं, जो चढ़ावे की गणना और जमा प्रक्रिया से जुड़े थे।
इस बीच ५ जून के एक कथित सीसीटीवी फुटेज को लेकर भी सवाल उठे हैं। दावा किया जा रहा है कि आरोपी अविनाश शुक्ला को पुलिस और बैंक कर्मचारियों की मौजूदगी में हिरासत में लिया गया था और उसके पास से नकदी बरामद हुई थी, जबकि औपचारिक प्राथमिकी बाद में दर्ज हुई। इस दावे की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि अभी आवश्यक है। यदि ट्रस्ट को कथित गड़बड़ी की जानकारी पहले मिल चुकी थी, तो तत्काल एफआईआर क्यों नहीं हुई और प्रारंभिक कार्रवाई किस स्तर पर रोकी गई-यह जांच का अहम विषय होना चाहिए।
ट्रस्ट सदस्य कृष्ण मोहन का बयान दर्ज किया गया है, जिनकी शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज होने की सूचना है। चंपत राय और अनिल मिश्रा के इस्तीफों की खबरें भी सामने आईं, हालांकि, शुरुआती दौर में इनके बारे में परस्पर विरोधी सूचनाएं रहीं। केवल इस्तीफा किसी आपराधिक जिम्मेदारी को सिद्ध नहीं करता, लेकिन इससे स्वतंत्र जांच की आवश्यकता समाप्त भी नहीं होती।
राजनीतिक हमला भी तेज हो गया है। आम आदमी पार्टी सांसद संजय सिंह ने आरोप लगाया कि कथित गड़बड़ी की शिकायत उन्होंने वर्ष २०२१ में उठाई थी। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इसे श्रद्धालुओं की आस्था से खिलवाड़ बताते हुए कहा कि जनता ‘रामधन’ का हिसाब मांग रही है। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी की जवाबदेही तय करने की मांग की है। ये राजनीतिक और सार्वजनिक आरोप हैं; संबंधित व्यक्तियों की कानूनी जिम्मेदारी जांच और अदालत में साक्ष्यों से ही निर्धारित होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सीबीआई के नेतृत्व वाली बहु-एजेंसी जांच की मांग करने वाली याचिका पर तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि मामला ग्रीष्मावकाश के बाद सामान्य प्रक्रिया में सूचीबद्ध होगा। याचिका में समयबद्ध जांच, डिजिटल एवं सीसीटीवी साक्ष्यों के संरक्षण और व्यापक वित्तीय पड़ताल की मांग की गई है।
पैâजाबाद बार एसोसिएशन द्वारा आरोपियों की पैरवी न करने और ऐसा करने वाले अधिवक्ता पर कार्रवाई की कथित घोषणा ने अलग कानूनी विवाद खड़ा कर दिया है। अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो, प्रत्येक आरोपी को वकील और निष्पक्ष सुनवाई का संवैधानिक अधिकार है। सामूहिक बहिष्कार से मुकदमे की वैधता प्रभावित हो सकती है और आरोपियों को सरकारी कानूनी सहायता उपलब्ध करानी पड़ सकती है।
राम मंदिर का चढ़ावा सामान्य धार्मिक आय नहीं है। इसमें देश-दुनिया के करोड़ों श्रद्धालुओं का विश्वास जुड़ा है। इसीलिए जांच केवल नकदी बरामद करने पर समाप्त नहीं हो सकती। दान पेटी से बैंक तक पूरी प्रक्रिया का फोरेंसिक ऑडिट, सोने-चांदी और आभूषणों का भौतिक सत्यापन, कर्मचारियों की नियुक्ति में रिश्तेदारी की जांच और जिम्मेदार पदाधिकारियों की भूमिका का निष्पक्ष परीक्षण आवश्यक है। आस्था की रक्षा नारों से नहीं, पारदर्शिता और जवाबदेही से होगी।

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