सामना संवाददाता / मुंबई
कम समय में बहुत ज्यादा और अच्छा-खासा मुनाफा रिटर्न देने के लुभावने वादा करने वाले पर करोड़ों के कथित इन्वेस्टमेंट फ्रॉड केस में मुंबई सेशंस कोर्ट ने तीन आरोपियों अंकित दीपक जैन, ओमकार सिंह और हेतुल रांका की जमानत याचिक खारिज कर दी है। यह मामला 500 से ज्यादा इन्वेस्टर्स और अनुमानित ₹100 करोड़ से ज्यादा की रकम से जुड़े एक कथित फाइनेंशियल स्कैम के सिलसिले में है।
शिकायत करने वालों की ओर से कोर्ट में पेश हुए वकील निमेश आर. मेहता ने जमानत अर्जी का विरोध करते हुए कहा कि यह मामला एक बड़े पैमाने पर आर्थिक अपराध से जुड़ा है, जिससे सैकड़ों इन्वेस्टर्स प्रभावित हुए हैं और इसकी पूरी जांच की जरूरत है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और उसके सामने रखे गए मटेरियल की जांच करने के बाद, सेशंस कोर्ट ने तीनों आरोपियों की जमानत अर्जी खारिज कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने फाइनेंशियल फ्रॉड और धोखाधड़ी को जघन्य अपराध माना है और इसमें बेल नहीं दी जा सकती। फाइनेंशियल फ्रॉड और धोखाधड़ी में संविधान के आर्टिकल 21 पर विचार नहीं किया जा सकता।
एडवोकेट निमेश मेहता ने उन इन्वेस्टर्स से अपील की है, जिन्होंने आरोपी या उनसे जुड़ी एंटिटीज़ में पैसा इन्वेस्ट किया हो, वे इन्वेस्टिगेशन एजेंसी से इन्वेस्टिगेशन रसीदें, एग्रीमेंट, बैंक स्टेटमेंट, पेमेंट रिकॉर्ड, वाट्सअप मैसेज, ईमेल और दूसरे जरूरी सबूत लेकर संपर्क करें, ताकि चल रही जांच में मदद मिल सके।
जानकारी के मुताबिक यह मामला एफआईआर नंबर 41/2025 से जुड़ा है, जिसे सीडीबी सीआईडी क्राइम ब्रांच, मुंबई के प्रॉपर्टी सेल ने रजिस्टर किया था। आरोपियों पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 के अलग-अलग प्रोविजन के साथ-साथ महाराष्ट्र प्रोटेक्शन ऑफ इंटरेस्ट्स ऑफ़ डिपॉजिटर्स (इन फाइनेंशियल एस्टैब्लिशमेंट्स) एक्ट, 1999 (एमपीआईडी एक्ट) के सेक्शन 3 और 4 के तहत मामला दर्ज किया गया है।
शिकायत करने वालों ने कहा कि कई पीड़ितों में रिटायर्ड सीनियर सिटिजन, सैलरी वाले कर्मचारी, प्रोफेशनल, छोटे बिजनेस के मालिक, महिलाएं और मिडिल क्लास परिवार शामिल हैं, जिन्होंने कथित तौर पर अपनी रिटायरमेंट सेविंग्स, प्रोविडेंट फंड, ग्रेच्युटी, फिक्स्ड डिपॉजिट और यहां तक कि उधार लिए गए फंड भी इन्वेस्ट किए हैं। कई परिवारों को कथित तौर पर फाइनेंशियल मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें घर के खर्चे, मेडिकल खर्च, बच्चों की पढ़ाई का खर्च और लोन चुकाने में मुश्किलें शामिल हैं।
