समुद्र किनारे!

चल रही हूं रेतीले समुंदर के किनारे,
कदमों के निशान छूट गए पीछे।
एक लहर आई चुपके से,
मिटा गई सारे छाप, जिन पर मुझे हुआ था गुमान।

सरसराती हवा बदन छूकर निकल गई,
मचलती हुई एक गुनगुनाहट निकल गई।
दूर-दूर किश्तियां क्षितिज पर ओझल हो रही।
सूरज सोच रहा कि मेरी कौन सुन रहा?
मैं भी हूं यहीं पर अपनी धूप लिए।
छुप जाता हूं बादलों की ओट में।
इन मेघों का मैं हूं जनक,
भूल जाता हूं कुछ क्षणों के लिए।

सागर हो रहा अभिमानी,
लहर-लहर अभिमान छलक रहा।
उठती-गिरती तरंगें राग अपना सुना रही।
तट पर बैठ मैं अचंभित हो रही।
प्रकृति की गोद कहीं बहुत मुलायम,
तो कहीं बहुत खुरदरी है।
गोद मां की है, यही कुछ कम नहीं है।

-बेला विरदी

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