सूत्रधार बनने को आतुर हर कोई,
हर डोर रहे बस अपने हाथ।
हर लगाम पर अपना अधिकार,
यही रहती इंसां के मन की चाह।
भूल गया वह अनजान,
जग का मालिक कोई और है।
तेरा सिंहासन क्षणभर का,
सच्चा दरबार कहीं और है।
झूठी सत्ता के मोह में पड़कर,
इंसानों को भरमा सकता है।
किन्तु अपने कर्मों का हिसाब,
क्या खुदा से छिपा पाएगा?
ऐसी सोच में डूबा बैठा,
मानो सदा यहीं रहना हो।
लालच का घर भरता जाता,
मानो कभी न जाना हो।
माटी का तन, माटी का मान,
फिर कैसा यह झूठा गुमान?
वक्त की एक ठोकर काफी,
मिट जाए क्षण भर में निशान।
सत्ता के मद में चूर होकर,
सौदागर बना फिरता है।
माटी का पुतला होकर भी,
खुद को सूत्रधार समझता है।
सूत्रधार एक ही जग का है,
न सत्ता तेरी, न तेरा अधिकार।
बाकी सब तो पात्र भर हैं,
क्षणभंगुर सत्ता के किरदार।
मुनीष भाटिया
ऐरो सिटी
मोहाली
