राजन पारकर
देश में तीन अलग-अलग घटनाएं एक ही सवाल खड़ा करती हैं कि व्यवस्था आखिर किसके लिए और कब जागती है? कहीं पेट्रोल-डीजल की पाबंदियां हटाकर राहत का एलान है, कहीं हत्या के मामले में नोटिस और कानूनी दांव-पेंच का नया मोड़ है, तो कहीं मुंबई की लोकल में सुरक्षा बढ़ाने की नौबत आई है। सरकार, प्रशासन और व्यवस्था की चाल ऐसी है कि जनता को हर दिन नया अध्याय पढ़ना पड़ता है। कभी तेल की लाइन में, कभी अदालत की लाइन में और कभी लोकल की भीड़ में। सरकार भी कमाल की चीज है! पहले जनता को नियमों की रस्सी से बांधों, फिर वही रस्सी खोलकर कहो, ‘देखो, हमने आजादी दे दी!’ खाड़ी क्षेत्र के तनाव और तेल संकट के नाम पर पेट्रोल-डीजल खरीद पर जो बंदिशें लगीं, अब वह हटाई जा रही हैं। यानी संकट आया तो जनता को लाइन में खड़ा कर दिया गया और संकट गया तो घोषणा की गई कि व्यवस्था बहाल हो गई। सवाल यह है कि आम आदमी को हर बार संकट का पहला ग्राहक और राहत का आखिरी ग्राहक क्यों बनाया जाता है? तेल वही, पंप वही, गाड़ी वही, बदली सिर्फ सरकारी घोषणा की भाषा!
‘अदालत में सच की तलाश और नोटिसों का तूफान!’
कानून की दुनिया भी बड़ी अजीब रंगमंच है। एक तरफ हत्या का गंभीर मामला, दूसरी तरफ आरोप, बयान, वकील और अब करोड़ों की नोटिस। ‘हमारे यहां मामला अदालत तक पहुंचते-पहुंचते इतना उलझ जाता है कि असली सवाल पीछे छूट जाता है और कागजों की फौज आगे निकल जाती है!’ १० करोड़ की नुकसान भरपाई की नोटिस ने इस मामले को नया मोड़ दिया है। अब देखना यह है कि अदालत में सच की आवाज ऊंची होती है या आरोप-प्रत्यारोप का शोर। क्योंकि जनता को तमाशा नहीं, न्याय चाहिए और न्याय की गति अगर धीमी हुई तो भरोसे की सांस भी धीमी पड़ती है।
‘सुरक्षा तब याद आती है जब खतरा दरवाजे पर दस्तक दे!’
मुंबई की लोकल सिर्फ ट्रेन नहीं, करोड़ों लोगों की रोज की जिंदगी है। लेकिन जब चलती ट्रेन में एक युवा की हत्या हो जाती है, तब सुरक्षा व्यवस्था की नींद खुलती है। अब बैग जांच, निगरानी और सुरक्षा बढ़ाने की बात हो रही है। यह कदम जरूरी है, लेकिन सवाल वही पुराना है, ‘सिस्टम को खतरे का इंतजार क्यों रहता है, खतरे को रोकने की तैयारी पहले क्यों नहीं होती?’ ‘मुंबई की लोकल इतनी तेज दौड़ती है कि कभी-कभी प्रशासन उससे भी पीछे रह जाता है!’ सुरक्षा केवल घोषणा से नहीं आती, वह लगातार जागरूकता, जवाबदेही और कार्रवाई से आती है। तेल की टंकी हो, अदालत का कटघरा हो या लोकल का डिब्बा, जनता हर जगह मौजूद है। फर्क सिर्फ इतना है कि कहीं उसे ग्राहक समझा जाता है, कहीं गवाह और कहीं यात्री। मगर हर जगह उसे सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन चाहिए, यही असली मुद्दा है।
