एड. कनई बिस्वास
धारा ११२, ११३ और ११४
भारतीय न्याय संहिता, २०२३ ने बदलते समय के अपराधों को ध्यान में रखते हुए छोटे संगठित अपराध और आतंकवादी कृत्य को विशेष रूप से परिभाषित किया है। इसके साथ ही कानून यह भी स्पष्ट करता है कि ‘चोट’ से कानूनी रूप से क्या अभिप्राय है। इन धाराओं का उद्देश्य संगठित अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण तथा मानव शरीर के विरुद्ध अपराधों की स्पष्ट कानूनी व्याख्या करना है।
केस स्टडी-१: ‘छोटा संगठित अपराध’ (धारा ११२)
एक गिरोह महानगर के अलग-अलग इलाकों में रोज़ाना जेबकतरी, मोबाइल छीनने, एटीएम कार्ड बदलकर ठगी और दुकानों से सामान चोरी जैसी वारदातें करता था। हर घटना छोटी थी, लेकिन पूरा गिरोह योजनाबद्ध तरीके से लगातार अपराध कर रहा था।
अदालत क्या देखेगी?
क्या अपराध संगठित गिरोह द्वारा किए गए?
क्या उनका उद्देश्य लगातार अवैध आर्थिक लाभ कमाना था? क्या वारदातें योजनाबद्ध और बार-बार की गई थीं?
फैसला-यह छोटे संगठित अपराध का मामला है। समझें: धारा ११२ के तहत ऐसे संगठित गिरोह, जो बार-बार छोटी लेकिन संगठित आपराधिक गतिविधियों में शामिल रहते हैं, उनके विरुद्ध विशेष कार्रवाई का प्रावधान है।
केस स्टडी-२: ‘आतंकवादी कृत्य’ (धारा ११३)
एक संगठन ने भीड़भाड़ वाले रेलवे स्टेशन पर विस्फोट कर लोगों में भय पैâलाने और देश की सुरक्षा को चुनौती देने की साजिश रची।
अदालत क्या देखेगी?
क्या कृत्य का उद्देश्य जनता में आतंक फैलाना था?
क्या विस्फोटक या अन्य घातक साधनों का उपयोग किया गया? क्या कृत्य से देश की एकता, अखंडता, सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित करने का उद्देश्य था?
फैसला-यह आतंकवादी कृत्य का मामला है। समझें: धारा ११३ के तहत ऐसा कृत्य, जिसका उद्देश्य देश की एकता, अखंडता, सुरक्षा को खतरे में डालना या जनता में आतंक फैलाना हो, आतंकवादी कृत्य माना जाता है।
केस स्टडी-३: ‘चोट की परिभाषा’ (धारा ११४)
एक व्यक्ति ने विवाद के दौरान दूसरे को मुक्का मारा, जिससे उसके चेहरे पर सूजन आ गई और चिकित्सकीय उपचार कराना पड़ा।
अदालत क्या देखेगी?
क्या पीड़ित को शारीरिक पीड़ा, रोग या शारीरिक दुर्बलता हुई?
क्या चोट आरोपी के कृत्य का परिणाम थी? क्या उपलब्ध साक्ष्य चोट सिद्ध करते हैं?
फैसला-यह चोट पहुंचाने का मामला है। समझें: धारा ११४ के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति के कृत्य से दूसरे को शारीरिक पीड़ा, रोग या शारीरिक दुर्बलता होती है, तो उसे ‘चोट’ माना जाता है।
भारतीय न्याय संहिता यह स्पष्ट करती है कि कानून केवल बड़े अपराधों पर ही नहीं, बल्कि संगठित ढंग से किए जाने वाले छोटे अपराधों पर भी समान रूप से कठोर है। वहीं आतंकवाद जैसे अपराधों के विरुद्ध विशेष और सख्त प्रावधान किए गए हैं तथा मानव शरीर को हुई ‘चोट’ की कानूनी परिभाषा भी स्पष्ट रूप से निर्धारित की गई है, ताकि न्यायालय प्रत्येक मामले का सही मूल्यांकन कर सके।
(अगले अंक में: धारा ११५, ११६ और ११७ – ‘स्वेच्छा से चोट पहुंचाना, गंभीर चोट और गंभीर चोट के प्रकार’ को आसान उदाहरणों के साथ समझेंगे।)
