प्रभुनाथ शुक्ल / भदोही
राजनीति में कब झंडा बदल जाई आ कब ओकर डंडा, ई बात भगवानो ना बता सकेलें। आज के जमाना में दल-बदलल एतना आसान हो गइल बा जेतना सावन के मौसम बदल जाला। भोर में तेज घाम निकलल, दुपहरिया में बरखा बरस गइल आ रात में चांद निकल आइल। बस एहिजे राजनीति के असली खेल बा।
भोरहीं नेताजी हरियर झंडा लेके घूमत मिलिहें, सांझ होते-होते भगवा ओढ़ लिहें। काल्ह तक जे पार्टी के गुणगान करत रहलें, आज उहे पार्टी के सबसे बड़ा दुश्मन बन गइलें। राजनीति अब सेवा ना, रंग बदलल गिरगिट के प्रतियोगिता हो गइल बा।
हमरा गांव-गिरांव में लोग कपड़ा मौसम देख के बदलेला, बाकी नेताजी सत्ता देख के झंडा बदल देलें। टिकट ना मिलल त दोसर पार्टी, उहां जगह ना मिलल त तिसरका पार्टी। जनता सोचत रह जाला कि नेता जी विचारधारा बदलले बाड़ें, जबकि असल में ऊ खाली गाड़ी पर लागल झंडा बदलले रहेलें।
राजनीति में झंडा से जादे डंडा के महत्व बा। ई डंडा चुनाव के समय जनता के सपना देखावे खातिर आ चुनाव जीतला के बाद जनता के चुप करावे खातिर इस्तेमाल होला। विरोधी पर ई डंडा गरजे ला, आ आम आदमी पर महंगाई, बेरोजगारी आ भ्रष्टाचार के डंडा बरसत रहेला।
नेताजी के खासियत ई बा कि ऊ हर मौसम में फिट हो जालें। सत्ता में रहिहें त विकास के मसीहा, विपक्ष में रहिहें त क्रांति के सिपाही। मंच पर रोइहें, हँसिहें, नाचिहें, गवइहें आ जरूरत पड़ल त एक-दूसरा पर कीचड़ो उछालिहें। बगुला भगत बनके हंस के चाल चलिहें।
जनता हर बेर सोचेला कि एह बेर कुछ बदली, बाकि बदलेला त खाली झंडा। सड़क उहे, समस्या उहे, बेरोजगारी उहे आ महंगाई उहे। नेता जी के गाड़ी पर नया झंडा जरूर लहरा जाला, बाकिर जनता के हाथ खाली वादा आ भरोसा के टूटल डंडा आवेला। लोकतंत्र में नेता राजा बन गइल बाड़ें आ जनता आजुओ प्रजा बनल घूमतिया। चुनाव आवेला त जनता मालिक कहल जाली, चुनाव बीतते ऊ फेरु भुला दिहल जाली। एहसे राजनीति के सबसे बड़ा सच इहे बा कि झंडा बदलत रहेला, डंडा बदलत रहेला, बाकिर जनता के हालत कमे बदलत बा।
