मुख्यपृष्ठस्तंभविजय-विमर्श : कमजोर मानसून नहीं, भारत की नीतियां चिंताजनक हैं

विजय-विमर्श : कमजोर मानसून नहीं, भारत की नीतियां चिंताजनक हैं

विजयशंकर चतुर्वेदी

बारिश की कमी अब सिर्फ खेती का नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, महंगाई, जल-प्रबंधन और ग्रामीण आय का गंभीर संकट बन चुकी है। १५० करोड़ की आबादी वाले भारत का आर्थिक ढांचा आज भी काफी हद तक मानसून पर निर्भर है। इसके बावजूद, नीति नियंताओं के बड़े-बड़े दावों और भाषणों में मौसम के इस बदलते मिजाज और उससे पैदा होने वाली चुनौतियों के प्रति गंभीरता नहीं दिखती। राजनीतिक भाषणों से इतर, देश को वर्तमान और भविष्य के इस संकट से उबारने के लिए एक सुनियोजित और ठोस रणनीति की तुरंत जरूरत है।
भाषणों की फसल और हकीकत
भारत की तमाम उपलब्धियों और दावों के बीच, हर वर्ष मानसून के साथ एक डरावना सच लौट आता है। बारिश सामान्य से कम हुई नहीं कि खेत की मेड़ से लेकर रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति, खाद्य महंगाई, ग्रामीण मांग, उद्योग, सरकारी वित्त और करोड़ों परिवारों की रसोई तक एक चिंता पसर जाती है।
इस वर्ष भी दक्षिण-पश्चिमी मानसून की शुरुआत अपेक्षाओं से कमजोर रही। जून के अंत तक देश में वर्षा सामान्य से लगभग ४२ प्रतिशत कम दर्ज की गई है, जिसके कारण खरीफ फसलों की बुआई में २३ प्रतिशत तक की गिरावट आई। धान, सोयाबीन, कपास और मक्का जैसी प्रमुख फसलों का रकबा पिछले वर्ष की तुलना में उल्लेखनीय रूप से घट गया है। यद्यपि मौसम विभाग ने जुलाई में वर्षा की स्थिति सुधरने की संभावना व्यक्त की है, लेकिन शुरुआती कमी ने कृषि और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए गंभीर संकेत दे दिए हैं।
कम बारिश के साथ-साथ असली चुनौती यह है कि वर्षा ऋतु का स्वभाव बदल रहा है। दक्षिण एशिया में मानसून अब अधिक अनिश्चित और असमान होता जा रहा है। कहीं लंबे सूखे के बाद कुछ दिनों में अत्यधिक वर्षा होती है, तो कहीं पूरे मौसम में पानी का गंभीर अभाव बना रहता है। कुल वर्षा का आंकड़ा भले ही आखिर में सामान्य दिखे, मगर खेती, जलाशयों और भूजल को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता।
लाचार भारतीय रिजर्व बैंक
भारत की लगभग आधी कृषि भूमि अब भी वर्षा पर निर्भर है। ऐसे में कमजोर मानसून केवल उत्पादन को प्रभावित नहीं करता, बल्कि ग्रामीण आय, आम उपभोग और रोजगार की पूरी शृंंखला को झटका देता है। आप जानते ही हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था में ग्रामीण मांग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब किसानों की आय घटती है, तब दोपहिया वाहनों की बिक्री से लेकर जरूरी उपभोक्ता वस्तुओं की मांग पर गंभीर असर दिखाई देता है। इसी के चलते अर्थशास्त्री कमजोर मानसून को कृषि ही नहीं, समूची अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा जोखिम मानते हैं।
भारत में महंगाई का सबसे संवेदनशील घटक खाद्य पदार्थ हैं। वर्षा की कमी से यदि दालें, तिलहन, सब्जियां और धान प्रभावित होते हैं तो उसका असर सीधे उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर पड़ता है। तब भारतीय रिजर्व बैंक के सामने भी दुविधा खड़ी हो जाती है और विकास को गति देने के लिए ब्याज दरों में कटौती की गुंजाइश नहीं रह जाती। आखिर खाद्य महंगाई पूरे मूल्य तंत्र को प्रभावित करती है। इस प्रकार एक कमजोर मानसून मौद्रिक नीति तक को प्रभावित कर सकता है।
नीति नियंताओं की ‘बाल’ बुद्धि
केंद्र सरकार ने इस बार ३०० से अधिक संवेदनशील जिलों के लिए आकस्मिक कृषि योजनाएं तैयार की हैं और कम पानी वाली फसलों, जल संरक्षण तथा स्थानीय जल संरचनाओं के पुनर्जीवन पर बल दिया है। यह स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन यह भी स्वीकार करना होगा कि हर वर्ष आकस्मिक योजना बनाना स्थायी समाधान नहीं हो सकता। समाधान कृषि और जल-प्रबंधन के उस मॉडल में है जो मानसून की अनिश्चितता को निश्चित मानकर तैयार किया जाए।
समय आ गया है कि भारत जल नीति और कृषि नीति को अलग-अलग विषयों की तरह देखना बंद करे। सूक्ष्म सिंचाई, वर्षाजल संचयन, भूजल का वैज्ञानिक उपयोग, स्थानीय तालाबों और जलाशयों का पुनर्जीवन, कम पानी वाली फसलों को प्रोत्साहन और जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियां अब विकल्प नहीं, आवश्यकता हैं। इसी के साथ शहरों को भी अपने जल उपभोग और जल-संरक्षण के मॉडल पर पुनर्विचार करना होगा, क्योंकि जल संकट गांव और शहर के बीच कोई भेद नहीं करता।
भारत की असली चिंता इस बात से कम नहीं होगी कि इस साल वर्षा का आंकड़ा रिकवर करता है या नहीं। असली परीक्षा यह होगी कि क्या हम हर बार अच्छे मानसून का इंतजार करने वाली अर्थव्यवस्था बने रहना चाहते हैं, या ऐसी व्यवस्था विकसित करेंगे जो बदलती जलवायु के साथ भी स्थिर रह सके। अगर मानसून का स्वभाव बदल चुका है, तो भारत को भी अपनी विकास-नीति का स्वभाव बदलना ही होगा। वरना इंद्र या वरुण देवता के लिए यज्ञ-हवन आदि करने से समस्या का हल निकलने वाला नहीं है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, कवि हैं)

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