सना खान
एक छोटे से कस्बे में एक सरकारी शिक्षक थे। वे हर साल अपनी तनख्वाह का एक हिस्सा उन बच्चों की पढ़ाई पर खर्च कर देते थे, जिनके माता-पिता फीस भरने में असमर्थ थे। उन्होंने कभी किसी से इसका जिक्र नहीं किया। उनका मानना था कि भलाई का सबसे बड़ा पुरस्कार किसी की मुस्कान होती है। धीरे-धीरे यह बात लोगों तक पहुंची। कुछ लोग उनकी तारीफ करने लगे, लेकिन कुछ ने सवाल उठाने शुरू कर दिए। ‘इतनी मदद कोई बिना मतलब नहीं करता।’ ‘जरूर लोगों में नाम कमाना चाहते होंगे। शिक्षक हर बात सुनते, लेकिन कभी सफाई नहीं देते। एक दिन उनके बेटे ने पूछा, ‘पिताजी, जब आप जानते हैं कि आपने कोई गलत काम नहीं किया, तो लोगों को जवाब क्यों नहीं देते?’ शिक्षक मुस्कुराए और बोले, ‘बेटा, हर आरोप का जवाब देना जरूरी नहीं होता। कई बार इंसान के कर्म ही उसकी सबसे सच्ची गवाही बन जाते हैं। लोग आज जो सोचते हैं, वह कल बदल सकता है, लेकिन अच्छे कर्मों का सच कभी नहीं बदलता। इसलिए अपना समय सफाई देने में नहीं, सही काम करते रहने में लगाओ।’ बेटा चुपचाप उनकी बात सुनता रहा। कुछ महीनों बाद जिले के मेधावी विद्यार्थियों के सम्मान में एक समारोह आयोजित किया गया। शिक्षक भी चुपचाप पीछे की पंक्ति में बैठे थे। उन्हें यह भी नहीं पता था कि मंच पर सम्मानित होने वाला छात्र उन्हीं बच्चों में से एक है, जिसकी पढ़ाई में उन्होंने वर्षों पहले मदद की थी। सम्मान ग्रहण करने के बाद छात्र ने अपना भाषण पूरा किया। फिर वह सीधे मंच से नीचे उतरा और सबसे पहले उस शिक्षक के चरणों में झुक गया। पूरा सभागार स्तब्ध रह गया। तभी लोगों को पहली बार पता चला कि वर्षों पहले उसकी पढ़ाई का सहारा वही शिक्षक थे, जिनकी नीयत पर कभी सवाल उठाए गए थे। शिक्षक ने उसे उठाकर गले लगा लिया। उनकी आंखों में आंसू थे, लेकिन होंठों पर वही पुरानी मुस्कान थी। उस दिन बेटे को समझ आया कि अच्छे कर्मों को अपनी सच्चाई साबित करने के लिए शब्दों की जरूरत नहीं होती। समय स्वयं उनका परिचय दे देता है। हर अच्छा इंसान हर किसी को अच्छा नहीं लगता। लोग आपको अपनी सोच से परखते हैं, लेकिन आपका चरित्र आपके कर्मों से पहचाना जाता है। इसलिए दुनिया को खुश करने से पहले अपने जमीर के सामने सच्चा रहना ज्यादा जरूरी है।
