मुख्यपृष्ठनए समाचारसंपादकीय : नाट्यदेवता!

संपादकीय : नाट्यदेवता!

मराठी नाट्यसृष्टि (रंगमंच) को वैभव की ऊंचाइयों पर ले जाने वाली विजयाबाई चली गईं। विजयाबाई मेहता सिर्फ मराठी की ही नहीं, बल्कि भारत के प्रायोगिक और व्यावसायिक रंगमंच की एक तेजस्वी दीपस्तंभ थीं! अब ये दीया बुझ गया है। अनगिनत रंगकर्मियों को गढ़ने वाली, कई नाटक रचने वाली, कितने ही नाट्यकर्मियों को गढ़नेवाली, नाटक के दीवाने रंगकर्मियों को नाटक की, अभिनय की बारीकियां सिखाने वाली विजयाबाई का बखान कितना भी करें, कम है! एक वाक्य में कहें तो विजयाबाई मेहता नाट्यकला का चलता-फिरता विद्यापीठ थीं। किसी भी विशेष दायरे में न बैठनेवाली, किसी छपे हुए पाठ्यक्रम की संकुचित चौखट में न बंधने वाली और पारंपरिक व आधुनिक नाट्यकला का सुंदर मेल कराकर वैश्विक रंगमंच को जीतने की अद्भुत क्षमता रखने वाली जीती-जागती विद्यापीठ ही थीं विजयाबाई! मंच पर केवल इधर से उधर और उधर से इधर जाना, संवाद फेंकना – विजयाबाई के लिए ये अभिनय नहीं था। ऊंची आवाज में संवाद बोलने से ही अभिनय की छाप पड़ती है, ये भी उन्हें मंजूर नहीं था। सौम्य आवाज में भी दर्शकों को बांधकर रखा जा सकता है, इस पर उनका विश्वास था। सहज भाव से कोई भी काम करते हुए, सब्जी चुनते हुए किए गए संवादों से नाटक में जान डालने का प्रयोग विजयाबाई ने किया, जो सफल रहा और दर्शकों को भी भाया। एक नाटक से पहले विजयाबाई ने तीन महीने तक सिर्फ एक वृद्ध स्त्री की तरह चलने की प्रैक्टिस की। उस स्त्री पात्र के पूरे जीवन के संघर्ष की थकान वे अपनी चाल में दिखाना चाहती थीं। किरदार में जान फूंकने पर उनका खास जोर रहता था। अभिनय में संवाद याद रखना आसान होता है, पर शरीर के माध्यम से किरदार को साकार करना कठिन है, ऐसा वो मानती थीं। अभिनेता को खुद से ज्यादा किरदार, व्यक्तिरेखा और पात्र को बड़ा करना चाहिए, इस पर उनका जोर रहता था। अपने कठोर अनुशासन से विजयाबाई ने मराठी रंगमंच और सिनेमा में मुक्त विचरण किया। पहले विजया जयवंत, फिर विजया खोटे और पहले पति के निधन के बाद बनीं विजया मेहता, ऐसे एक ही जीवन में ये तीन भूमिकाएं निभाते हुए विजयाबाई ने जो
नाट्य प्रवास
किया या जो नाट्य यात्रा उन्होंने दर्शकों को कराई, वो निश्चित ही आसान नहीं था। मगर कला में रचा बसा मन, ‘नाटक’ के इन तीन अक्षरों के प्रति अपार लगाव और लगातार कुछ नया सीखने के जुनून के दम पर विजयाबाई नाट्यकला के क्षेत्र में मन भरकर विचरती रहीं। मुंबई विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र और राजनीतिशास्त्र की डिग्री लेते समय ही वरिष्ठ मराठी समीक्षक वा. ल. कुलकर्णी ने सबसे पहले उनके अंदर के नाट्यगुणों को पहचाना। साहित्य मंडल के एक कार्यक्रम में एक प्रसंग का विजयाबाई द्वारा किया गया अभिवाचन सुनकर प्रा. कुलकर्णी ने उन्हें नाटक में काम करने की सलाह दी। विजयाबाई ने वो सलाह तुरंत मान ली। दिल्ली के ‘नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा’ नामक प्रसिद्ध नाट्य संस्थान में इब्राहिम अल्जी और मर्जबान से नाट्यकला के गुर सीखने के बाद उन्होंने भारतीय विद्या भवन और मुंबई मराठी साहित्य संघ के नाट्य प्रयोगों में अभिनेत्री के रूप में काम शुरू किया। ‘ओथेल्लो’ के मराठी रूपांतरण ‘झुंजारराव’ नाटक में ‘कमलजा’ की भूमिका से उनका अभिनय सफर शुरू हुआ। ‘संशयकल्लोल’, ‘तुझे आहे तुजपाशी’, ‘मेनका’, ‘सुंदर मी होणार’ वगैरह नाटकों में काम करके भी उनका मन नहीं भरा। सिर्फ अभिनय करके ही बैठ जाएं, विजयाबाई ऐसी नहीं थीं! कुछ नया करने के जुनून वाली विजयाबाई ने १९६० के आस-पास प्रसिद्ध नाटककार विजय तेंडुलकर, निर्देशक-अभिनेता अरविंद देशपांडे और श्रीराम लागू जैसे दिग्गजों के साथ मिलकर मुंबई में ‘रंगायन’ नामक संस्था की स्थापना की। उस समय आर्थिक रूप से सफल होने वाले व्यावसायिक नाटकों का दौर था। विजयाबाई ने नवीनता, प्रयोगशीलता और सामाजिक प्रतिबद्धता जैसे मूल्यों को मानने वाले प्रायोगिक नाटक ‘रंगायन’ के जरिए लाए। सालाना सिर्फ दस रुपए चंदा लेकर एक हजार सदस्य दर्शक बनाए गए। पूरे दस साल तक ये आंदोलन चलता रहा। इसी दौरान विजयाबाई और विजय तेंडुलकर की जोड़ी ने कई
दर्जेदार नाटक
दिए। कुमारी माताओं का नाजुक मुद्दा उठाने वाले ‘श्रीमंत’ नाटक से इस आंदोलन की शुरुआत हुई। मराठी रंगमंच के पुनरुद्धार का ये स्वर्णकाल था। १९७२ में ‘रंगायन’ संस्था बंद हो गई, पर मराठी रंगमंच को वैभव की ऊंचाइयों तक ले जाने का उद्देश्य विजयाबाई ने पूरा कर लिया था। ‘पार्टी’ फिल्म में उनकी भूमिका बहुत चर्चित हुई। ‘रावसाहेब’ और ‘पेस्तनजी’ जैसी विजयाबाई द्वारा निर्देशित फिल्में लोकप्रिय हुईं। ‘अजब न्याय वर्तुळाचा’, ‘एक शून्य बाजीराव’, ‘एका घरात होते’, ‘मला उत्तर हवंय’, ‘हमिदाबाईची कोठी’, ‘संध्याछाया’, ‘बैरिस्टर’, ‘पुरुष’, ‘वाडा चिरेबंदी’ जैसे एक से बढ़कर एक उम्दा नाटक विजयाबाई ने किए। १९७३ से १९९६ के दौरान उन्होंने व्यावसायिक नाटक किए। अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच पर भी उन्होंने धूम मचाई। इंडो-जर्मन थिएटर प्रोजेक्ट के लिए ‘मुद्राराक्षस’, ‘शाकुंतल’, ‘हयवदन’, ‘नागमंडल’ जैसे नाटक उन्होंने जर्मन रंगमंच पर निर्देशित किए। जम&नी के नाट्य दश&कों ने विजयाबाई के सारे प्रयोग सिर आंखों पर उठाए। प्रायोगिक और व्यावसायिक नाटकों के साथ-साथ टेलीफिल्म्स, दूरदश&न धारावाहिक, फिल्में इन सभी क्षेत्रों में उन्होंने अभिनय और निदे&शन का काम किया। अभिनय की पद्धति पर व्याख्यान भी दिए। नाना पाटेकर, विक्रम गोखले, नीना कुलकणी&, रिमा लागू, प्रतिमा कुलकणी& से लेकर हाल के समय की अमृता सुभाष जैसे नाट्य कलाकारों की पीढ़ियां विजयाबाई ने तैयार कीं। विजयाबाई मेहता मतलब नाट्यक्षेत्र की मूति&मान प्रयोगशाला थीं। उन्होंने अभिनय किया, नाटक निदे&शन किया, फिल्में निदे&शित कीं, टेलीफिल्म्स बनाईं, सीरियल्स भी बनाए। साथ ही नाट्य शिक्षक के रूप में कई नामी रंगकमी& भी रंगमंच को दिए। वैश्विक रंगमंच पर महाराष्ट्र की पहचान बनाई और रंगमंच का ये ‘जिम्मा’ पूण& कर विजयाबाई अब स्वग&वासी हो गई हैं। नाट्यशास्त्र की जानकार ये नाट्यदेवता अब अंतिम यात्रा पर निकल पड़ी हैं। देवी-देवताओं, पदा& उठाओ, विजयाबाई का स्वागत करो!

अन्य समाचार