-धार्मिक आस्था और मंदिरों की सुरक्षा
-कानूनी पहलू और समाधान
अयोध्या के रामधन चोरी के मामले में एक बार फिर मंदिरों के चढ़ावे की सुरक्षा को लेकर बहस छेड़ दी है। मंदिरों का सरकारी नियंत्रण और उनकी सुरक्षा केवल वित्तीय व्यवस्था का मामला नहीं है, बल्कि यह सनातन समाज की आस्था, मान-सम्मान और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील विषय है। भारत में ‘प्रâी हिंदू टेंपल्स’ (मंदिरों को सरकारी चंगुल से मुक्त करो) आंदोलन इसी पृष्ठभूमि में गति पकड़ रहा है, जिसका मुख्य तर्क यह है कि जब अन्य धर्मों के धार्मिकस्थल स्वतंत्र हैं, तो केवल हिंदू मंदिरों पर ही सरकारी नियंत्रण क्यों?
ऐतिहासिक और संवैधानिक आधार
भारतीय संविधान के अनुच्छेद २६ के तहत सभी धार्मिक संप्रदायों को अपने मामलों के प्रबंधन का अधिकार प्राप्त है। वहीं, संविधान की ७वीं अनुसूची (समवर्ती सूची) सरकारों को धार्मिक संस्थाओं के नियमन का अधिकार देती है। इसी का लाभ उठाकर कई राज्यों ने ‘हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त’ जैसे कानून बनाए हैं। आंदोलनकारियों का तर्क है कि यह व्यवस्था अनुच्छेद १४ और १५ (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करती है।
सुप्रीम कोर्ट के तीन मील के पत्थर फैसले
इस कानूनी खींचतान में देश की सर्वोच्च अदालत ने समय-समय पर महत्वपूर्ण सीमाएं तय की हैं।
१. शिरूर मठ मामला (१९५४): सुप्रीम कोर्ट की ७ जजों की बेंच ने स्पष्ट किया कि सरकार केवल मंदिर के धर्मनिरपेक्ष कार्यों (जैसे वित्तीय और प्रशासनिक प्रबंधन) को देख सकती है, लेकिन वह धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा-पद्धति में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
२. चिदंबरम नटराज मंदिर मामला (२०१४): कोर्ट ने ऐतिहासिक पैâसला सुनाते हुए कहा कि सरकार किसी मंदिर में कुप्रबंधन को ठीक करने के लिए केवल अस्थायी नियंत्रण ले सकती है। समस्या दूर होते ही प्रबंधन वापस ट्रस्ट को सौंपना होगा; सरकार अनिश्चितकाल के लिए कब्जा नहीं रख सकती।
३. पद्मनाभस्वामी मंदिर मामला (२०२०): सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाई कोर्ट के पैâसले को पलटते हुए त्रावणकोर शाही परिवार के ‘शेबैत’ (रक्षक) अधिकारों को बहाल रखा और मंदिर के प्रबंधन को सरकारी नियंत्रण से बचाकर एक स्वतंत्र समिति को सौंप दिया।
अदालती फैसलों के बावजूद, आज भी अकेले तमिलनाडु में लगभग ४०,००० से अधिक मंदिर सरकारी नियंत्रण में हैं। इतिहास गवाह है कि सरकारी नियंत्रण वाले पद्मनाभस्वामी और सबरीमाला जैसे मंदिरों में भी चोरियां हुईं, जबकि निजी ट्रस्टों द्वारा संचालित अक्षरधाम या इस्कॉन का प्रबंधन सुरक्षित माना जाता है।
अत: वास्तविक समाधान केवल स्वामित्व बदलने में नहीं, बल्कि जवाबदेही और आधुनिक तकनीक (डिजिटल ऑडिट, सीसीटीवी और बायोमेट्रिक सुरक्षा) में है। एक ऐसी स्वायत्त और पारदर्शी व्यवस्था बननी चाहिए, जिसमें संतों और प्रबंधन विशेषज्ञों की भागीदारी हो और जिसका ऑडिट ‘वैâग’ जैसी स्वतंत्र संस्था करे, ताकि आस्था भी सुरक्षित रहे और धन भी।
