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महाराष्ट्रनामा: ‘मोहर की स्याही सूखने से पहले सोच लो!’ करार रद्द, लेकिन शुल्क वापस नहीं

राजन पारकर

खबरें अलग-अलग दुनिया की हैं, लेकिन तीनों के बीच एक गहरा रिश्ता है इंसान का हिसाब। कहीं सरकार दस्तावेजों का हिसाब मांग रही है, कहीं नियम जेब का हिसाब बदल रहे हैं और कहीं इंसान को अपने कर्मों का हिसाब याद दिलाया जा रहा है। एक तरफ करारों की दुनिया में नई सख्ती है, दूसरी तरफ आर्थिक जीवन में नए नियमों की दस्तक है और तीसरी तरफ जिंदगी के अंतिम सच पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। महाराष्ट्र सरकार ने विकास करारों की दुनिया में ऐसा ताला लगाने की तैयारी की है कि अब दस्तखत करने से पहले सौ बार सोचना पड़ेगा। वर्षों से ऐसा देखा जा रहा था कि बड़े-बड़े करार किए जाते थे, लाखों-करोड़ों का मुद्रांक शुल्क भरा जाता था और फिर जब व्यापारिक समीकरण बदले या रिश्तों में दरार आई तो वही लोग सरकार के दरवाजे पर पहुंचकर कहते थे, ‘करार खत्म हो गया, अब शुल्क वापस कर दीजिए।’ सरकार ने अब इस सोच पर ही रोक लगाने का पैâसला किया है। करार कोई ऐसा कपड़ा नहीं था कि पसंद आया तो रख लिया और पसंद नहीं आया तो दुकान पर लौटाकर पैसे मांग लिए। जब दस्तावेज पर मुहर लग गई, जब समझौते की गाड़ी कानून की सड़क पर उतर गई, तो बाद में उसका रास्ता बदलने से सरकारी खजाने की जिम्मेदारी खत्म नहीं होगी। सरकार का कहना है कि मुद्रांक शुल्क दस्तावेज के अस्तित्व पर लगता है, उसके सफल या असफल होने पर नहीं। कई लोगों ने कानून की खिड़की से रास्ता निकालने की कोशिश की, अब सरकार ने उसी खिड़की पर मजबूत जाली लगाने की तैयारी कर ली है। प्रशासन के लिए भी यह बड़ी परेशानी थी कि पहले करार हो, फिर विवाद हो, फिर रद्दीकरण हो और फिर रिफंड की फाइलों का पहाड़ खड़ा हो जाए। अब संदेश साफ है। जमीन, विकास और करार के खेल में कलम चलाने से पहले दिमाग चलाइए, क्योंकि बाद में पछतावे की स्याही कोई मिटा नहीं पाएगी।
जुलाई आई है, जेब को संभालकर रखिए!’ नियमों की नई बारिश
जु लाई का महीना आम आदमी के लिए ऐसा मेहमान बनकर आया है, जो घर में कदम रखते ही खर्चों की सूची निकाल देता है। नए नियमों के साथ पासपोर्ट से लेकर टैक्स और बैंकिंग तक कई बदलाव सामने हैं। आम नागरिक के जीवन में अब वैâलेंडर की तारीखें भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई हैं, जितनी जेब में रखी रकम। पासपोर्ट शुल्क में बदलाव का मतलब है कि विदेश यात्रा के सपनों पर अब सरकारी फीस का नया वजन महसूस होगा। दूसरी तरफ आयकर रिटर्न दाखिल करने की अंतिम तारीख सामने है। सरकार कहती है, आपकी कमाई का हिसाब चाहिए और नागरिक सोचता है मेरी महंगाई और खर्चों का हिसाब कौन पूछेगा? क्रेडिट कार्ड की दुनिया में भी चमकते प्लास्टिक कार्ड के पीछे छिपे नियम बदल रहे हैं। जो रिवॉर्ड कभी आकर्षण लगते थे, अब उनकी शर्तें समझनी होंगी। बैंकिंग क्षेत्र में गलत तरीके से बेचे गए वित्तीय उत्पादों पर नई व्यवस्था ग्राहकों को सुरक्षा देने की कोशिश करेगी। पहले कई बार ग्राहक सुविधा समझकर सौदा कर लेता था और बाद में पता चलता था कि सुविधा के नाम पर बोझ मिल गया। आज के दौर में पैसा जेब में कम और मोबाइल ऐप में ज्यादा रहता है, इसलिए हर नया नियम सीधे आम आदमी की जिंदगी तक पहुंचता है। जुलाई का संदेश यही है। नियमों को नजरअंदाज मत कीजिए, क्योंकि आजकल नियम इंसान को नहीं, इंसान नियमों को पढ़ने के लिए मजबूर है।
‘मौत के बाद रिश्तों की
असली परीक्षा?’ एक कड़वा आईना
चमकती फिल्मी दुनिया को छोड़कर अलग राह चुननेवाली सना खान की एक बात ने सोशल मीडिया पर चर्चा छेड़ दी है। उनकी बातों का केंद्र एक ऐसा सवाल है, जिसे सुनना आसान नहीं लेकिन सोचना जरूरी है, इंसान के जाने के बाद उसके लिए सच में कौन खड़ा रहता है? आज के समय में रिश्तों की तस्वीरें हजारों होती हैं, सोशल मीडिया पर शुभकामनाओं की भीड़ होती है, लेकिन असली रिश्ते उस समय दिखाई देते हैं जब दिखावे की रोशनी बुझ जाती है। इंसान जिंदगीभर नाम, पैसा और पहचान बनाने में लगा रहता है, लेकिन कभी-कभी यह भूल जाता है कि अंतिम पहचान उसके कर्मों से बनती है। परिवार, दोस्त और रिश्तेदार जिंदगी का सहारा जरूर होते हैं, लेकिन रिश्तों की मजबूती केवल नाम से नहीं, व्यवहार से तय होती है। यह सवाल केवल किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि हर इंसान के लिए एक आईना है कि उसने अपने पीछे कैसी यादें छोड़ी हैं। दुनिया जीतने की दौड़ में इंसान अक्सर खुद से हार जाता है। इसलिए शायद सबसे बड़ा हिसाब बैंक खाते का नहीं, बल्कि इंसानियत के खाते का होता है। अंत में न पद काम आता है, न प्रसिद्धि। चरित्र ही वह दस्तावेज है जिस पर जिंदगी की अंतिम मुहर लगती है। सरकार कागजों का हिसाब मांग रही है, व्यवस्था पैसों का हिसाब बदल रही है और जिंदगी इंसान से उसके कर्मों का हिसाब पूछ रही है।

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