मुख्यपृष्ठस्तंभफलसफा :  हर माफी रिश्ते को पहले जैसा नहीं बना सकती

फलसफा :  हर माफी रिश्ते को पहले जैसा नहीं बना सकती

सना खान

एक कंपनी में दो सहकर्मी साथ काम करते थे। दोनों अच्छे दोस्त भी थे। वर्षों से उन्होंने हर सफलता और हर मुश्किल साथ देखी थी। एक दिन एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट के दौरान एक बड़ी गलती हो गई। पूरी टीम के सामने एक सहकर्मी ने बिना सोचे-समझे अपने दोस्त पर ही दोष लगा दिया। उस समय दूसरे ने कुछ नहीं कहा। जांच हुई, तो सच्चाई सामने आ गई। गलती उसकी नहीं थी।
मीटिंग खत्म होने के बाद पहला सहकर्मी उसके पास आया। उसकी आंखें झुकी हुई थीं। वह बोला, ‘मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। उस समय मैं डर गया था। मुझे माफ कर दो।’
दूसरे ने बिना देर किए कहा, ‘मैंने तुम्हें माफ कर दिया।’ दोनों फिर साथ काम करने लगे। दिन बीतते गए, लेकिन अब पहले जैसी सहज बातचीत नहीं रही। पहले जहां हर छोटी बात साझा होती थी, वहां अब शब्द सोच-समझकर बोले जाने लगे। रिश्ता बच गया था, लेकिन उसका भरोसा पहले जैसा नहीं रहा। कई महीनों बाद दोनों ऑफिस की छत पर बैठे थे। पहले सहकर्मी ने धीमी आवाज में पूछा, ‘क्या तुमने सच में मुझे माफ कर दिया था?’
वह मुस्कुराया और बोला, ‘हां, माफ कर दिया था, लेकिन उस दिन मैंने पहली बार यह भी सीखा कि भरोसा टूटने की आवाज नहीं होती। इसलिए उसे जुड़ने में सबसे ज्यादा समय लगता है।’
पहला सहकर्मी लंबे समय तक चुप रहा। उसे समझ आ गया कि कुछ शब्द सिर्फ उस पल को नहीं बदलते, वे रिश्तों का भविष्य भी बदल देते हैं। उस दिन दोनों ने एक बात महसूस की कि माफी इंसान को छोटा नहीं बनाती, लेकिन शब्दों का चुनाव इंसान को बड़ा या छोटा जरूर बना देता है।
माफी रिश्ते बचा सकती है, लेकिन भरोसा वापस पाने में समय, धैर्य और लगातार सही व्यवहार लगता है, इसलिए ऐसे शब्द कहने से पहले रुक जाना बेहतर है, जिनके लिए बाद में पूरी जिंदगी माफी मांगनी पड़े।

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