मनमोहन सिंह
मान लीजिए, कल सुबह उठते ही आपके सिर में एक हल्का सा दर्द होता है। डॉक्टर के पास जाने के बजाय, आप अपना स्मार्टफोन उठाते हैं और सर्च बार में टाइप करते हैं, ‘सिरदर्द के कारण’। कुछ ही मिनटों में आपके सामने माइग्रेन से लेकर ब्रेन ट्यूमर जैसी गंभीर बीमारियों की एक लंबी लिस्ट आ जाती है। इसे पढ़कर आपकी धड़कनें तेज हो जाती हैं और आप मान लेते हैं कि आपको कोई लाइलाज बीमारी है। अगर ऐसा आपके साथ भी होता है, तो आप अकेले नहीं हैं। इस स्थिति को साइबरकॉन्ड्रिया कहा जाता है।
क्या है साइबरकॉन्ड्रिया?
यह मूल रूप से हाइपोकॉन्ड्रिया (बीमारी का अकारण डर) का डिजिटल रूप है, जिसे आम भाषा में ‘डॉक्टर गूगल’ सिंड्रोम भी कहते हैं। इसमें लोग अपने सामान्य शारीरिक लक्षणों के बारे में इंटरनेट पर अत्यधिक शोध करने लगते हैं, जिससे उनकी हेल्थ एंजायटी यानी स्वास्थ्य संबंधी चिंता कम होने के बजाय और ज्यादा बढ़ जाती है।
मुख्य लक्षण और प्रभाव
अनिवार्य चेकिंग: इसके मरीज दिन में कई बार अपने लक्षणों को ऑनलाइन खोजते रहते हैं।
बढ़ती घबराहट: इंटरनेट पर मौजूद विरोधाभासी और अधूरी जानकारी से व्यक्ति शांत होने के बजाय और अधिक तनाव में आ जाता है।
आईडीआईओटी प्रभाव: इसका सबसे खतरनाक पहलू यह है कि लोग इंटरनेट के आधे-अधूरे ज्ञान के चक्कर में अपने वास्तविक डॉक्टर द्वारा बताए गए इलाज और दवाओं को बीच में ही छोड़ देते हैं।
साइबरकॉन्ड्रिया से बचने के उपाय
डॉक्टर वैशाली शेलार जो एक साइवैâट्रिस्ट हैं, बताती हैं कि भाग्यवश कुछ समझदारी भरे कदम उठाकर इस डिजिटल चक्रव्यूह से बाहर निकला जा सकता है।
लक्षणों को सर्च करना बंद करें
शरीर में कोई भी बदलाव दिखने पर तुरंत गूगल या यूट्यूब पर उसके कारण खोजना बंद करें। इंटरनेट एल्गोरिदम अक्सर सबसे बुरे नतीजों को पहले दिखाता है।
प्रमाणित स्रोतों पर भरोसा करें
यदि जानकारी लेना बेहद जरूरी हो, तो सोशल मीडिया के बजाय डब्ल्यूएचओ, विश्व स्वास्थ्य संगठन या ‘मेयो क्लिनिक’ जैसी प्रमाणित वेबसाइटों का ही रुख करें। याद रखें कि इंटरनेट के पास डेटा है, लेकिन डॉक्टर के पास ‘डिग्री और अनुभव’। किसी भी बीमारी के सही निदान के लिए हमेशा एक योग्य चिकित्सक से परामर्श लें।
गूगल एक बेहतरीन सर्च इंजन है, लेकिन वह आपका डॉक्टर नहीं हो सकता। अपनी सेहत को इंटरनेट के डर से नहीं, बल्कि सही डॉक्टरी सलाह से सुरक्षित रखें।
