रामदिनेश यादव
पिछले कुछ वर्षों में देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। विपक्ष, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों का एक वर्ग यह आरोप लगाता रहा है कि सत्ता के दबाव में जांच एजेंसियां, पुलिस और कई संस्थाएं यहां तक कि न्याय व्यवस्था भी निष्पक्षता खोती जा रही हैं। ऐसे माहौल में मुंबई हाई कोर्ट की एक सख्त टिप्पणी ने न केवल सत्ता व पुलिस प्रशासन को आईना दिखाया, बल्कि आम लोगों के बीच न्यायपालिका के प्रति भरोसे को भी मजबूत किया है।
विरोध करना आधार नहीं
मामला एसडीपीआई के सचिव सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी के खिलाफ जारी तड़ीपार आदेश से जुड़ा था। पुलिस का आरोप था कि उन्होंने केंद्र सरकार की नीतियों के विरोध में प्रदर्शन किए और ‘भाजपा मुर्दाबाद’ तथा ‘अमित शाह मुर्दाबाद’ जैसे नारे लगाए। इसी आधार पर उनके खिलाफ कार्रवाई की गई थी। लेकिन हाई कोर्ट ने इस कार्रवाई को खारिज करते हुए स्पष्ट कहा कि सरकार का विरोध करना या नारे लगाना अपने आप में किसी व्यक्ति को तड़ीपार करने का आधार नहीं बन सकता।
आप जनता के सेवक हैं…
सुनवाई के दौरान अदालत की यह टिप्पणी विशेष रूप से चर्चा में रही कि आप प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के नौकर नहीं, बल्कि जनता के सेवक हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में धरना-प्रदर्शन और सरकार की नीतियों का विरोध नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है और पुलिस का काम उस अधिकार को कुचलना नहीं, बल्कि कानून के दायरे में उसकी रक्षा करना है।
उनके पास वॉशिंग मशीन
न्यायालय की सबसे तीखी टिप्पणी तब आई, जब उसने व्यंग्य करते हुए कहा कि यदि सारे मामले खत्म कराने हैं तो दल बदल लीजिए, उनके पास वॉशिंग मशीन है। अदालत की इस टिप्पणी को राजनीतिक गलियारों में सत्ता के दुरुपयोग पर अप्रत्यक्ष लेकिन कड़ा संदेश माना जा रहा है। इतना ही नहीं, अदालत ने चेंबूर में पेड़ गिरने से एक मासूम बच्चे की मौत का उल्लेख करते हुए यह भी सवाल उठाया कि जनता से जुड़े गंभीर मुद्दों के बजाय राजनीतिक जोड़-तोड़ और दल-बदल पर अधिक चर्चा होना दुर्भाग्यपूर्ण है। हाल के वर्षों में जिस तरह मीडिया की निष्पक्षता पर बहस तेज हुई और ‘गोदी मीडिया’ जैसे शब्द आम चर्चा का हिस्सा बने, उसी तरह न्यायपालिका को लेकर भी समय-समय पर आशंकाएं व्यक्त की जाती रही हैं।
अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में बड़ा संदेश
ऐसे दौर में मुंबई हाई कोर्ट की यह टिप्पणी और निर्णय अनेक लोगों के लिए इस बात का संकेत माना जा रहा है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायपालिका अब भी नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए स्वतंत्र रूप से हस्तक्षेप कर सकती है। यही कारण है कि इस फैसले की व्यापक चर्चा हो रही है और इसे संविधान तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
