न्यायाधीश माधव जामदार का जितना शुक्रिया अदा किया जाए, उतना कम है। मौजूदा वक्त में देश और जनता एक खौफनाक इम्तिहान के दौर से गुजर रहे हैं। सरकार के खिलाफ बोलना या लिखना आज देशद्रोह जैसा जुर्म मान लिया गया है। ऐसा करनेवाले कुछ लोगों को तड़ीपार (जिलाबदर) किया जा रहा है तो कुछ को जेल की सलाखों के पीछे धकेल दिया गया है। जो बाहर हैं, उन्हें अपनी राय जाहिर करने की मनाही है। यह एक तरह का अघोषित आपातकाल (इमरजेंसी) ही है। सरकार ने अवाम को गुलाम बना दिया है। इस तानाशाही के कान उमेठने का काम मुंबई हाई कोर्ट के जस्टिस माधव जामदार ने किया है। सरकार की नीतियों के खिलाफ नारेबाजी करने वाले सईद अहमद अब्दुल वाजिद चौधरी पर चेंबूर पुलिस ने बर्बर कार्रवाई करते हुए उन्हें तड़ीपार कर दिया था। जब यह तड़ीपारी का मामला जस्टिस जामदार के सामने आया तो उन्होंने दो टूक सवाल किया, ‘क्या जनता सरकार की गुलाम है?’ कभी लोकमान्य तिलक ने ‘क्या सरकार का दिमाग ठिकाने है?’ यह तीखा सवाल पूछकर ब्रिटिश हुकूमत के पसीने छुड़ा दिए थे। आज जस्टिस जामदार के इस सवाल ने कि ‘क्या जनता सरकार की गुलाम है?’ सत्ता के गलियारों में वैसी ही खलबली मचा दी है। मुल्क में आज लोकतंत्र को पैरों तले रौंदा जा रहा है। हुक्मरानों ने यह तय कर लिया है कि जनता के दिल का हौसला, उनका साहस और उनकी अभिव्यक्ति ही असल में अपराध है। देश के संवैधानिक प्रावधानों, संसदीय परंपराओं और सार्वजनिक व्यवस्था, सबको ताक पर रख दिया गया है। सरकार की इस दमनकारी कार्यशैली पर कड़ा प्रहार करते हुए जस्टिस जामदार ने कहा कि ‘भाजपा मुर्दाबाद, अमित शाह मुर्दाबाद’ जैसे नारे लगाना किसी को तड़ीपार करने की वजह नहीं हो सकता। सरकार का विरोध करना नागरिकों का बुनियादी हक है। सरकार के फैसलों से असहमति जताना किसी नागरिक को
तड़ीपार करने का आधार
नहीं बन सकता। आज आए दिन परीक्षाओं के पेपर लीक हो रहे हैं। और जब नागरिक इसके खिलाफ आवाज उठाते हैं, तो आप उन पर मुकदमे ठोक देते हैं। यह क्या मामला है? जस्टिस जामदार ने महाराष्ट्र की इस विकृत राजनीति की धज्जियां उड़ा कर रख दीं। उन्होंने कहा, ‘एक दस साल के स्कूली बच्चे की हादसे में मौत हो जाती है और विधानमंडल में चर्चा क्या चल रही है? कि डिप्टी स्पीकर का चुनाव वैâसे हुआ? उन्होंने वैâसे एक पार्टी से दूसरी पार्टी में छलांग लगाई, जिससे वह रातों-रात ‘पवित्र’ हो गए!’ जस्टिस जामदार इतने पर ही नहीं रुके, उन्होंने मौजूदा ‘वॉशिंग मशीन संस्कृति’ पर भी करारा तंज कसा। उन्होंने याचिकाकर्ता को सीधा सुझाव दे डाला, ‘आपको भी दलबदल कर लेना चाहिए। अगर अपने ऊपर लगे मुकदमों को रफा-दफा कराना है तो पाला बदल लीजिए। वहां एक वॉशिंग मशीन रखी है।’ जस्टिस जामदार ने इस सरकारी तानाशाही को आईना तो दिखा दिया, लेकिन हासिल क्या? यह तो ‘उल्टे घड़े पर पानी’ जैसा है! सरकार ने मान लिया है कि पाशविक बहुमत के दम पर उसे मनमानी करने का लाइसेंस मिल गया है और यह बहुमत भी तो चुराया हुआ है! तुर्रा यह कि इस चोरी पर विपक्ष को मुंह खोलने की भी इजाजत नहीं है। पूरे देश में खौफ और दहशत का माहौल बना दिया गया है। लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय और देशबंधु चित्तरंजन दास जैसे रहनुमाओं ने हमें क्या सिखाया था? आखिरकार हमने आजादी इसलिए हासिल की थी, ताकि हम ‘निर्भय’ हो सकें। यही आजादी का असल मकसद था। लेकिन अगर आजादी के सत्तर साल बाद भी हम अपनी राय ईमानदारी से रखने में खौफ खा रहे हैं तो यह मानना होगा कि हमने
तरक्की नहीं, बल्कि अवनति
की हैं। अगर कोई चाटुकारिता या लाचारी में चुप बैठा है, तो बात अलग है; लेकिन अगर लोग डर के मारे खामोश हैं या उन्हें जबरन खामोश किया जा रहा है तो यह सरासर गलत है। डर के साए में रहकर अगर लोग मोदी-शाह सरकार के कसीदे पढ़ रहे हैं, तो उस तारीफ के कोई मायने नहीं हैं। मगर आज देश का यही कड़वा सच है, सब कुछ लाठी के दम पर चल रहा है। आज अवाम की हालत यह है कि इंसाफ की उम्मीद जगाने वाला कोई सिस्टम बचा ही नहीं है। सरकार उनकी सुनती नहीं, पुलिस उनकी परवाह नहीं करती, संसद और विधानसभाओं में उनकी आवाज दबा दी जाती है और अदालतें भी सियासी चश्मे से ‘न्यायबाजी’ कर रही हैं। ऐसे में जनता के हिस्से सिर्फ तड़ीपारी और जिल्लत की ठोकरें ही आ रही हैं। जस्टिस माधव जामदार का यह सख्त और बेबाक बयान इस घोर अंधकार के दौर में आया है, जहां देश की जनता अपनी तमाम उम्मीदें खोकर खुद को एक अंधेरी गुफा के हवाले कर चुकी थी। राम मंदिर की चोरी पर चुप रहना है; सोनम वांगचुक जंतर-मंतर पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के लिए १५ दिनों से अनशन पर बैठे हैं, लेकिन किसी को ‘नीट’ पेपर लीक पर मुंह नहीं खोलना है। विधायक और सांसद पचास-पचास करोड़ में सरेआम बिक रहे हैं, फिर भी जनता इस भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘मुर्दाबाद’ का नारा नहीं लगा सकती! जालिम सरकार के खिलाफ मुट्ठियां तानना और आवाज उठाना देश के हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। मगर मौजूदा हुकूमत ने अवाम को इस कदर दबा दिया है कि वे अपने अधिकार ही भूल चुके हैं। जस्टिस जामदार ने जनता को ‘निर्भय बनो’ का मंत्र दिया है। सच तो यह है कि हर न्यायमूर्ति में ऐसा ही हौसला होना चाहिए, लेकिन हाल के दिनों में अदालतों ने अपनी रीढ़ खो दी है। ऐसे दौर में जस्टिस जामदार ने जो दिलेरी दिखाई है, उसके लिए उनका आभार मानना ही होगा!
