मुख्यपृष्ठस्तंभप्रणवाक्षर : इस दुविधा के पीछे क्या है

प्रणवाक्षर : इस दुविधा के पीछे क्या है

प्रणव प्रियदर्शी

विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने पिछले दिनों विस्तार से समझाया कि भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्तों को लेकर हाल में विभिन्न व्यक्तियों ने जो भी बयान दिए हैं, उनसे सरकार का कोई लेना-देना नहीं है। दुनियाभर में दर्जनों ऐसे इवेंट होते रहते हैं जिनमें लोग शामिल होते हैं, अपनी बात कहते हैं लेकिन उनका सरकार की पॉलिसी या रुख के संदर्भ में ज्यादा मतलब नहीं होता और यह भी कि भारत सरकार इन बयानों को संज्ञान में भी नहीं लेती।
चर्चित बयान
विदेश सचिव का यह स्पष्टीकरण ऐसे समय आया, जब भारत और पाकिस्तान के कई रिटायर्ड सैन्य अधिकारियों, राजनयिकों तथा नेताओं के ‘ट्रैक टू’ डिप्लोमेसी के तहत विदेशों में मिलने और बातचीत करने की खबरें आई थीं, जो यह संकेत दे रही थीं कि दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधारने की कोशिशें तेज हो रही हैं। इसी बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले का यह चर्चित बयान भी आया कि पाकिस्तान की ओर से कोई आतंकवादी कार्रवाई होती है तो उसका माकूल जवाब जरूर देना चाहिए, लेकिन उसके साथ बातचीत की एक खिड़की भी खुली रखनी चाहिए। खुद संघप्रमुख मोहन भागवत की भी यह नसीहत आ गई कि पाकिस्तानी स्टेट और पाकिस्तानी लोगों के बीच फर्क किया जाना चाहिए। पाकिस्तानी स्टेट जरूर भारत के खिलाफ है, लेकिन पाकिस्तानी नागरिकों में बहुत से ऐसे हैं, जो दोनों देशों के बीच बेहतर रिश्ते चाहते हैं।
साझा अपील
रही-सही कसर उस खास पहल ने पूरी कर दी, जिसमें भारत और पाकिस्तान की सौ से ज्यादा नामी-गिरामी हस्तियों ने एक साझा बयान पर हस्ताक्षर करते हुए दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों से यह अपील की कि दोनों पड़ोसी मुल्कों के बीच बातचीत शुरू की जाए और रिश्तों को सामान्य बनाया जाए। हस्ताक्षर करनेवालों में ६१ भारतीय हैं और ५५ पाकिस्तानी। इनमें जम्मू-कश्मीर के दो-दो पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती, रॉ के पूर्व प्रमुख ए एस दुलत, राज्यसभा सांसद मनोज झा जैसे लोग शामिल हैं।
काल्पनिक और मनगढ़ंत
इन सबकी वजह से यह कयास लगाए जाने लगे थे कि क्या सरकार के अंदर पाकिस्तान के प्रति अपनी स्पष्ट और घोषित नीति-आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते, पर पुनर्विचार की जरूरत महसूस की जा रही है। लेकिन तभी बीजेपी महासचिव और संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य राम माधव ने एक अंग्रेजी अखबार में प्रकाशित अपने लेख में ट्रैक टू डिप्लोमेसी को लेकर चल रही तमाम चर्चाओं को काल्पनिक और मनगढ़ंत बता दिया। उनके मुताबिक, सरकार अपनी मौजूदा नीति को लेकर पूरी तरह स्पष्ट और दृढ़ है।
परस्पर विरोधी संकेत
पहले विदेश सचिव और फिर बीजेपी तथा संघ के एक महत्वपूर्ण नेता की ओर से आया यह स्पष्टीकरण बताता है कि कम से कम फिलहाल सरकार अपने रुख में किसी तरह के बदलाव के लिए तैयार नहीं है। लेकिन सवाल उठता है कि फिर विदेश नीति के इतने अहम और संवेदनशील मसले पर इस तरह के परस्पर विरोधी संकेत क्यों दिए जा रहे हैं? आखिर दत्तात्रेय होसबले कोई ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जिन्हें महज एक इंडिविजुअल कह कर पल्ला झाड़ लिया जाए। यह भी याद रखना चाहिए कि चाहे पूर्व सैन्य अधिकारी हों या राजनयिक या फिर सिविल सोसाइटी की हस्तियां विदेश नीति से जुड़े संवेदनशील मसलों पर कोई भी नई पहल मनमाने ढंग से नहीं की जा सकती। किसी न किसी स्तर पर उसे सरकार का समर्थन और इजाजत चाहिए होती है।
बदलते समीकरण
जाहिर है, पाकिस्तान के साथ संभावित द्विपीय बातचीत को लेकर बने संदेह, दुविधा और असमंजस के इस माहौल के पीछे किसी न किसी रूप में सरकार के अंदर का ही अनिश्चय है और इस अनिश्चय के पीछे अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के बदलते समीकरणों की ठोस हकीकत है। इसमें कोई संदेह नहीं कि ऑपरेशन सिंदूर के सैन्य नतीजे चाहे जो भी रहे हों, कूटनीतिक मोर्चे पर उसका लाभ लेने में मोदी सरकार बुरी तरह नाकाम साबित हुई।
ऊंचा स्थान
सैन्य मुकाबले में पिट चुके देश के रूप में पाकिस्तान को अंतर्राष्ट्रीय फजीहत का सामना करते हुए दिखना चाहिए था, लेकिन हकीकत यह है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद वह न केवल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नजरों में अपनी उपयोगिता बढ़ा चुका है, बल्कि ईरान-अमेरिका युद्ध में मध्यस्थता की बदौलत अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अपना स्थान ऊंचा करने में भी कामयाब रहा है। ऐसे में उसे अलग-थलग करने की भारत की कोशिशें कम से कम फिलहाल निरर्थक लगने लगी हैं।
भ्रांत धारणा
ऐसे माहौल में इस राय को मजबूती मिलनी स्वाभाविक है कि पाकिस्तान से किसी न किसी स्तर पर एन्गेज होना चाहिए, उसे एन्गेज करना चाहिए। लेकिन मोदी सरकार ने तो मानो ‘धुरंधर’ जैसी फिल्मों से बनते नैरेटिव को ही अपनी नीति का मूल आधार बना रखा है। वह इस भ्रांत धारणा को अपने समर्थकों के मन से मिटने नहीं देना चाहती कि जब चाहे पाकिस्तान को दुनिया के नक्शे से मिटाया जा सकता है। पाकिस्तान के साथ बातचीत का पैâसला इस धारणा को कमजोर करेगा, जिसका नतीजा मोदी सरकार को अपने मुख्य और सबसे कट्टर समर्थक वर्ग के मोहभंग के रूप में झेलना पड़ सकता है।
असल वजह
यही मोदी सरकार की दुविधा का असली कारण है। देखना होगा कि यह दुविधा खुद मोदी सरकार के लिए और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत की साख के लिए कितना महंगा सौदा साबित होती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और समीक्षक हैं।)

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