-‘इथेनॉल’ की एक्स्ट्रा डोज और हमारी गाड़ियों का ‘हाजमा’
ईश्वरी राज
सरकार ने एक बार फिर सीना तानकर कहा है,‘भैया, भरोसा रखो! हमारी गाड़ियों में जो इथेनॉल (गन्ने और अनाज से बना अल्कोहल) मिलाया जा रहा है, वह पूरी तरह से टेस्टेड है। बिल्कुल बेस्ट प्रैक्टिसेज के तहत हो रहा है।’
सुनकर दिल को बड़ा सुकून मिलता है, लेकिन जैसे ही आम आदमी अपनी बाइक या कार की टंकी की तरफ देखता है, एक ही सवाल गूंजता है,‘साहब, ये तो ठीक है, पर हमारी गाड़ियों का हाजमा कब ठीक होगा? सरकार इस पर पूरी तरह कब जागेगी?’
वैसे सरकार का टारगेट बड़ा ‘नेक’ है यानी पेट्रोल में बीस प्रतिशत इथेनॉल मिलाना। इससे विदेशी तेल पर निर्भरता घटेगी और प्रदूषण कम होगा, जिससे किसान भाई भी खुश रहेंगे। सब चकाचक है! लेकिन पेंच वहां फंसता है, जहां पुरानी गाड़ियों के इंजन इस एक्स्ट्रा पेग को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। इथेनॉल के कोरेसिव स्वभाव के कारण फ्यूल पाइप और सील जैसी रबर और प्लास्टिक की चीजें गलने लगती हैं। इसके अलावा, इथेनॉल में पेट्रोल के मुकाबले कम एनर्जी होती है जिससे माइलेज में गिरावट आती है और जेब पर एक्स्ट्रा बोझ पड़ता है। सबसे बड़ी आफत यह है कि यह हवा की नमी को अपनी तरफ खींचता है, जिससे पानी सोखने के कारण इंजन चलते-चलते बंद हो जाता है।
सरकार की ‘थ्री-स्टेप’ नींद!
आम जनता को लगता है कि सरकार इस मामले में तीन चरणों में जागती है।
घोषणा फेज (गहरी नींद)। ‘हम २० प्रतिशत क्या, कल को ५० प्रतिशत मिला देंगे!’ (गाड़ियों के इंजन थर-थर कांपने लगते हैं)।
सफाई फेज (आंखें मलना)। जब मैकेनिकों की दुकानें गाड़ियों से भरने लगती हैं, तो सरकार कहती है,‘अरे, हमने तो ‘एक्सटेंसिव ट्रायल्स’ किए हैं, डरने की कोई बात नहीं है।’
एक्शन फेज (पूरी तरह जागना)। अब उम्मीद है कि सरकार सिर्फ तेल कंपनियों पर नहीं, बल्कि उन करोड़ों पुरानी गाड़ियों के मालिकों के दर्द पर भी जागेगी, जिन्हें री-फिटिंग किट या फ्यूल स्टेबलाइजर्स की सख्त जरूरत है।
सरकार मेरे पर्यावरण बचाना जरूरी है, लेकिन ऐसा न हो कि पर्यावरण बचते-बचते आम आदमी की जेब का ‘इंजन’ ही सीज हो जाए। उम्मीद है सरकार जल्द ही केवल कागजी ट्रायल्स से आगे बढ़कर, सड़क पर रेंगती पुरानी गाड़ियों के लिए भी कोई ‘संजीवनी’ लाएगी!
