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पूर्वी सिंहभूम में मलेरिया का कहर :  6 मौतें, 1,731 से अधिक संक्रमित…केंद्र सरकार की उदासीनता चिंताजनक…झारखंड को तत्काल ₹1,000 करोड़ का विशेष स्वास्थ्य पैकेज मिले-विजय शंकर नायक, झारखंड प्रदेश कांग्रेस, प्रदेश प्रवक्ता

अनिल मिश्र / रांची

पूर्वी सिंहभूम जिले में मलेरिया के भयावह प्रकोप पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि स्वास्थ्य विभाग की 29 जून से 10 जुलाई 2026 तक की डे-वाईज़ रिपोर्ट के अनुसार पिछले 12 दिनों में 77,770 लोगों की मलेरिया जांच की गई। इनमें 71,849 रैपिड डायग्नोस्टिक टेस्ट (RDT) तथा 5,921 स्लाइड परीक्षण शामिल हैं। उन्होंने कहा कि इन जांचों में 1,731 लोगों में मलेरिया संक्रमण की पुष्टि हुई है तथा औसत संक्रमण दर 2.41 प्रतिशत दर्ज की गई है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि अब तक 6 लोगों की मृत्यु हो चुकी है। लगातार सामने आ रहे नए मामले इस बात का संकेत हैं कि संक्रमण अभी पूरी तरह नियंत्रण में नहीं आया है।यह उक्त बातें झारखंड प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता
विजय शंकर नायकने बताया कि 10 जुलाई को अकेले 14,200 लोगों की जांच की गई, जिसमें 128 नए संक्रमित मिले। सर्वाधिक प्रभावित प्रखंडों में पोटका (35), घाटशिला (21), पटमदा (21) तथा डुमरिया (19) शामिल हैं। राहत की बात यह है कि अर्बन मानगो और अर्बन बिरसानगर क्षेत्रों से उस दिन एक भी नया मामला सामने नहीं आया। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य विभाग के लिए सबसे बड़ी चिंता प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम (Plasmodium falciparum – PF) संक्रमण है, जिसे ब्रेन मलेरिया का प्रमुख कारण माना जाता है। पिछले 12 दिनों में मिले 1,731 संक्रमितों में से 1,361 मरीज इसी घातक वेरिएंट से संक्रमित पाए गए हैं, जबकि 10 जुलाई को मिले 128 नए मामलों में 93 मरीज पीएफ संक्रमण के शिकार हैं। यह स्थिति बताती है कि बीमारी का स्वरूप अत्यंत गंभीर है और तत्काल व्यापक हस्तक्षेप की आवश्यकता है।
विजय शंकर नायक ने कहा कि पूर्वी सिंहभूम के पोटका, डुमरिया, पटमदा, घाटशिला और मुसाबनी जैसे आदिवासी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में संक्रमण का तेजी से फैलना इस बात का प्रमाण है कि वेक्टर जनित रोगों की रोकथाम के लिए केंद्र सरकार की दीर्घकालिक रणनीति अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकी है। मानसून से पहले मलेरिया-प्रभावित जिलों को पर्याप्त संसाधन, दवाइयां, जांच किट और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराना केंद्र सरकार की जिम्मेदारी थी। उन्होंने केंद्र सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि सरकार करोड़ों रुपये प्रचार-प्रसार पर खर्च करती है, लेकिन जब आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में लोग मलेरिया जैसी रोकी जा सकने वाली बीमारी से अपनी जान गंवा रहे हैं, तब उसकी संवेदनशीलता दिखाई नहीं देती। छह लोगों की मृत्यु केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उन परिवारों की अपूरणीय क्षति है, जिन्हें समय पर सुदृढ़ सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के माध्यम से बचाया जा सकता था।विजय शंकर नायक ने झारखंड सरकार एवं राज्य स्वास्थ्य विभाग की सक्रियता का स्वागत करते हुए कहा कि बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग अभियान, विशेष चिकित्सा दलों की तैनाती, अतिरिक्त चिकित्सकों को प्रभावित क्षेत्रों में भेजना, घर-घर जांच, दवाओं की उपलब्धता, जनजागरूकता अभियान तथा मच्छर नियंत्रण के लिए चलाए जा रहे अभियान सराहनीय हैं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार संकट की गंभीरता को समझते हुए लगातार सक्रिय है, लेकिन इस व्यापक जनस्वास्थ्य संकट से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए केंद्र सरकार का पूर्ण सहयोग अनिवार्य है।विजय शंकर नायक ने केंद्र सरकार से निम्नलिखित मांगें कीं-• पूर्वी सिंहभूम सहित मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों के लिए कम से कम ₹1,000 करोड़ का विशेष केंद्रीय स्वास्थ्य सहायता पैकेज तत्काल घोषित किया जाए।• राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम के अंतर्गत झारखंड को अतिरिक्त वित्तीय एवं तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई जाए।
• विशेषज्ञ चिकित्सकों, महामारी विशेषज्ञों एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की केंद्रीय टीम तत्काल प्रभावित क्षेत्रों में भेजी जाए।
• मलेरिया जांच किट, एंटी-मलेरियल दवाओं, कीटनाशकों एवं मच्छरदानियों की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित की जाए।
• आदिवासी एवं दूरस्थ गांवों में मोबाइल मेडिकल यूनिट तथा 24×7 विशेष स्वास्थ्य शिविर संचालित किए जाएँ।
• मलेरिया से मृत व्यक्तियों के परिजनों को उचित आर्थिक सहायता प्रदान करने हेतु केंद्र सरकार राज्य सरकार के साथ समन्वय स्थापित करे।
अंत में विजय शंकर नायक ने कहा कि जनस्वास्थ्य पर राजनीति नहीं, बल्कि जवाबदेही और संवेदनशीलता होनी चाहिए। पूर्वी सिंहभूम का यह संकट पूरे देश के लिए चेतावनी है। यदि केंद्र सरकार अभी भी केवल औपचारिक समीक्षा बैठकों तक सीमित रही और प्रभावित राज्यों को समय पर पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं कराए, तो भविष्य में ऐसे प्रकोप और गंभीर रूप ले सकते हैं। झारखंड जैसे मलेरिया-प्रभावित राज्यों के साथ सहकारी संघवाद की भावना के अनुरूप खड़ा होना केंद्र सरकार की संवैधानिक एवं नैतिक जिम्मेदारी है।

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