सोलह सावन बिता दिए राज महल में
दासियों सखियों संग खेली थी जी भरके
दौड़ी भागी अटारियों गलियारों में
भर भर झोली तोड़े पुष्प बाग बगीचों से
गद्दों और गालीचों पर सजायें सुंदर ढंग से
गले में मुक्ता की माला
हाथों में कंगन कर्णफूल कानों में
पहन वस्त्र रेशमी इठला रही महलों में
चांदी के पिंजरे में एक सुग्गा हे पाला
पंख हरे ,लाल चोंच गले में कंठी माला
मै और सुग्गा खूब बतियाते मस्ती करते
प्रसाद के गलियारे झाड़ फ़ानूसों से दमकते
इत्र से महकते फव्वारे चलते
सबकुछ था पर नहीं था कोई प्रेमी
मेरी बहनें सखियां मुझको ताने कसती
सबकी थी अपनी एक प्रेम कहानी
प्रेम पत्रों की थी सबकीआनी जानी
जो भाया युवराज मुझे वहां निकली शत्रुता बरसों पुरानी
उड़ गया सुग्गा पा कर अच्छा मौका
मुझे चिढ़ा रहा उसका खाली पिंजरा
पहर बीतते मेरे कांधों पर पुनः आ बैठा
गुणगान एक सुदर्शन राजकुमार के गाने लगा
तुम्हारी सुंदरता के गीत भी गा कर आया हूं
अब न कहना तुम्हारे काम नहीं आया हूं
सिहर गई डर से ,सुन तो नहीं लिया किसी ने
तभी एक धवल कपोत गवाक्ष पर आ बैठा
इत्र से महकता एक प्रेमपत्र पग में बांध लाया
अब होगी शुरू मेरी भी प्रेम कहानी
जी भर कर सुनाऊंगी
अपनी और शहजादे की बातें मधुर सुहानी
प्रेम पत्रों की होगी आदान प्रदानी
जैसे लगी खोल कर पढ़ने उसे,
तभी मां का ऊंचा बोल कानों में गूंजा
उठना नहीं, अब देखो कितना दिन निकल आया
क्या हे मां ? कुछ देर सोने दो मुझको
पहला प्रेम पत्र तो पढ़ लेने दो मुझको
न महल न कपोत, न कोई सुग्गा
कहां चले गये गवाक्ष और झरोखे
उड़ गया कपोत जो लाया था पहला प्रेम पत्र
मुझे लगा हे मेरे सपने का जोरदार धक्का।
-बेला विरदी
