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वैवस्वत मनु (उपन्यास)

प्रमोद भार्गव

४-आत्म-चेतना के लिए हवन

मनु को स्मृतियों के स्मरण से आत्मबल की गहरी अनुभूति हुई। अतएव अगली सुबह वे जल्दी उठ गए। अपने मन और मस्तिष्क में वे शांति व स्वस्थता का अनुभव कर रहे हैं। उनींदी से आंखों से मनु गुफा से बाहर आए तो देखा कि सूर्य किरणों की प्रखरता से संपूर्ण प्रकृति की उज्जवलता, स्वच्छ व स्वछंद दिखाई दे रही है। प्रकृति के इस उल्लासमयी परिवेश से मनु का मन भी प्रफुल्लित हुआ। उनका उल्लसित मन अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को पुनः प्रयोग में लाकर क्रियान्वित करने को हुआ। इस विचार के मन में आते ही, उन्होंने सोचा कि परंपरा का प्रारंभ इन विपरीत परिस्थितयों में करना हवन से उचित होगा। अग्नि उनके पास है, हवन में होम के लिए फल-फूल जुटा लेंगे। समिधा के लिए वे लकड़ियां भी खोजेंगे, जिनका प्रयोग करने से परिवेश शुद्ध होता है और शारीरिक बल पुष्ट होता है। इस समय वे यज्ञ कर नहीं सकते, क्योंकि यह एक विस्तृत और जटिल प्रक्रिया है। वैसे भी यज्ञ का लघुरूप हवन है। यज्ञ में मंत्रों, देवताओं, आहुतियों के साथ ऋत्विक और दक्षिणा का प्रावधान है। अब, जब प्रलय में ऋत्विक और देवता रहे ही नहीं तो वे पुरोहित (ऋत्विक) कहां से लाएं? हवन में ऐसी कोई बाध्यकारी मान्यता नहीं है। अतएव वे बर्फ पिघलते शुद्ध जल के पोखर में प्रलय के बाद पहली बार स्नान करने के बाद हवन-पूजन करेंगे। तदंतर सूर्य और वायु को आहार के रूप में ग्रहण कर पोषक तत्वों को आत्मसात करेंगे। प्रकृति का यह कितना विलक्षण वरदान है कि पेड़-पौधों की तरह मानवीय-काया स्वयं ही आवश्यक तत्व ढूंढ कर अवशोषित कर लेती है। इस अवधि में मनु ने यह भी अनुभव किया कि रोम-छिद्र भी सूर्य, वायु और जल से प्राकृतिक रूप में शरीर का पोषण करते हैं। मनु को अपनी ज्ञान परंपरा से जुड़ी बहुत सी स्मृतियों के चैतन्य होने का अनुभव हो रहा है। कई अनार्य जो सनातन विरोधी थे, वे मदारी के बीन या तुरही की बजती ध्वनि-तरंगों के वसशीभूत हो नाचते नाग को देखकर कहा करते थे, इसके तो कान ही नहीं होते, तब यह बीन की ध्वनि कैसे सुन सकते हैं? परंतु सनातन में तो यही लोक मान्यता हजारों साल से चली आ रही है कि सांप, सपेरे के बजाऐ बीन के संगीत से आंदोलित होता है। मनु ने तो अनेक बार सपेरे के संकेतों पर सर्प को नाचते और बीन पर फुंकार मारते देखा है। यानी वह यह भी समझ रहा होता था कि जो सुर उसे आंदोलित कर रहे हैं, वे इस बीन से प्रस्फुटित हो रहे हैं। फिर भी वाममार्गी कहते रहे हैं, सांप के कान नहीं होते हैं। जब ये बातें लोक में प्रचलित होने लग गईं, तब आर्य ऋषि इस जीव की प्रकृति को समझने के लिए आगे आए। उन्होंने सपेरों से बीन बजाना सीखा और सर्प के कान हैं या नहीं, इस अध्ययन में लग गए। इस तथ्य को लेकर तो कोई दो मत नहीं था कि सर्प के शरीर में प्रत्यक्ष कान दिखाई नहीं देते हैं। प्राकृतिक रूप से मृत सर्पों के शव-विच्छेदन के परीक्षण से ज्ञात किया कि यह तो प्रत्येक रोम छिद्र से सुनता है। इसके रोएं-रोएं में वायु के साथ ध्वनि तरंगे प्रवेश कर जाती हैं और यह सुन लेता है। इसके पूर्व मनुष्यों पर किए परीक्षणों से ऋषि वैज्ञानिकों ने भली-भांति जान लिया था कि मानव केवल नाक से ही सांस नहीं लेता, अपितु रोओं के माध्यम से पूरे शरीर से सांस लेता है। यदि मानव की नासिका खुली छोड़ दी जाए और पूरे शरीर को चिकनी गीली मिट्टी से लेप करके बंद कर दिया जाए तो वह अकेले नासिका छिद्रों से कितनी भी सांसें ले तीन एक प्रहर में मर जाएगा। वास्तव में वायु और ध्वनि शरीर में केवल नाक और कान से ही प्रविष्ट नहीं हो रहे हैं, अपितु पूरे शरीर से रोम छिद्रों से भीतर जा रहे हैं। अतएव सर्प के कान भले ही नहीं हैं, वह पूरे शरीर से सुनने की क्षमता रखता है। इसी प्रकार वायु पेड़-पौधों ही नहीं भोजन का भी आधार बनती है। मनु ने जिस एक नीवी (अधोवस्त्र, धोती) के साथ प्रलय संकट से जीवन की मुक्ति पाई थी, उसके अलावा उन्हें एक दिन सरस्वती नदी के किनारे भटकते हुए अजिन (मृग-छाल) भी मिल गई थी। उसे भी वे अब कमर में बांध लिया करते हैं। अतएव उन्होंने हिमालय के शिखरों के बीच प्राकृतिक कुंड के पारदर्शी जल में धोती पहने हुए स्नान के बाद मृगछाल लपेट ली। मनु अग्नि की प्राप्ती के बाद से ही सिंधु-घाटी के इस हिम-सारस्वत प्रातंर में भटकते हुए हवन के लिए प्रयुक्त होने वाली सामग्री एकत्रित करते रहे हैं। उन्हें देवदार, पीपल, वटवृक्ष की लकड़ियों के साथ जौ के दाने भी प्रलय की मार से बचे पौधों से मिल गए हैं। मनु जानते हैं, जो आर्यवर्त में अति प्राचीन स्वयंभवु मनु के बल से ही उपलब्ध कृषि अनाजों में से एक है। तभी इसका उपयोग आहार के साथ-साथ यज्ञ और हवन में किया जाता रहा है। मनु को ज्ञात है कि देवदार या देवदारू वृक्ष को देवताओं का वृक्ष भी कहा जाता रहा है। इसकी लकड़ी और पत्तियों में तीव्र ज्वलनशील अग्नि के वास के साथ सुगंध भी होती हैं। यह आग जल्दी इसलिए पकड़ता है, क्योंकि इसकी आंतरिक परतों में तेल की अधिकता होती है। मनु यही चिंतन-मनन करते हुए गुफा के द्वार पर प्राकृतिक हवन कुंड में समिधाएं पत्तियों के साथ-साथ व्यवस्थित रूप में रखने लगे। तदंतर उन्होंने पत्थरों में घर्षण कर अग्नि प्रज्जवलित की और उसके चेतने के साथ जौ के दानों को होम करते हुए मंत्रोच्चारण करले लगे…,
‘ओजोस्योजो में दाः स्वाहा।
सहोसी सहो मे दाः स्वाहा।
बलमासि बलं मे दाः स्वाहा।
आयुरस्यामुर्मे दाः स्वाहा।
श्रोतमसि श्रोत्रं मे दाः स्वाहा।
चक्षुरसि चक्षुर्मे दाः स्वाहा।
पारिपाणमसि परिपाणं मे दाः स्वाहा।’
अथर्ववेदः 2.17
अर्थात, हे सर्वव्यापी ब्रह्म! तेरे भीतर तेज, आवेश एवं प्रकाश है, अतः इन्हें मुझे प्रदान कर मेरे भीतर शारीरिक सामर्थ्य बढ़ा। तू सहनशीलता से युक्त है, अर्थात मुझे भी सहने की शक्ति दे। तुझमें असीम बल है, अतएव मुझे भी पराक्रमी बना। जिस जिजीविषा से तेरी आयु काल-कालांतर से निरंतर बनी हुई है, वह जीवनी शक्ति मुझे दे। हे ब्रह्म! तुझमें ध्वनि तरंगों को समझने और उनकी व्याख्या करने की असीम क्षमता है, वह श्रवण शक्ति मुझे दे। तुझमें देखने की क्षमता असीम है, तू प्रत्येक वस्तु के दर्शन कर लेता है। मेरी आंखों में भी वह दूर-दर्शन करने की दृष्टि दे। हे ब्रह्म! तेरे भीतर उपरोक्त सब शक्तियां अनंत एवं असीम हैं, अतएव मुझे तो अंश मात्र दे, जिससे आपदा की घड़ी में, मैं जीवन को समर्थ बना सकूं।
इस मंत्रोच्चारण के बाद मनु प्रसन्नचित्त हुए। उन्हें अनुभव हो रहा था कि प्रलय से अनायास उत्पन्न हुई जिन जटिलतम भूल- भूलैया में वे भटक रहे थे, उसमें शनैः-शनैः ठहराव आ रहा है। जिस अस्थिरता और तनावग्रस्तता से वे अब तक व्यथित थे, वह ढीली पड़ रही है। स्थितियां चाहे जितनी भी प्रतिकूल हों, अंततः वे परिवर्तित होती हैं। उम्मीद की अपेक्षा उन्हें सहने के योग्य बना देती है, यदि व्यक्ति संभवना बनाए रखे। अपेक्षित प्रयास करें तो उपलब्धियां हाथ आने ही लगती हैं। इस अपेक्षा के क्रम में मनु ने अग्नि सुरक्षित कर ली। आहार की पूर्ति हेतु वायु और प्रकाश का सेवन आरंभ कर दिया। हवन करने के लिए आवश्यक हवन सामग्री भी खोज ली। ब्रह्म को अर्पित की जाने वाली हवि के लिए जौ भी मिल गए और उन्होंने इस पवित्र व सात्विक आहार को ब्रह्म के लिए हवन अर्पित भी कर दिया। उनके पास अभी यही था, भविष्य में संभव है कि है कि घृत (घी) भी मिल जाए ? घी मिलता है तो गाएं भी मिलेंगी। गाएं मिलेंगी तो गाय के साथ बछेरू भी होंगे। बछेरू बैल बनेंगे और फिर वे खेती करेंगे। खेती करेंगे तो अन्न की पैदावार होगी। अन्न ही वह रस है, जिसे आहार बनाने से शरीर को पौष्टिक बनाए रखने वाले रसों की उत्पत्ति होती है। अनाज मिल जाएगा तो फिर वे वायु और प्रकाश रूपी शुष्क व बे स्वाद भेजन को ग्रहण करना बंद कर देंगे। परंतु शरीर को स्वस्थ, सुडौल और आकर्षक बनाकर वे बिना स्त्री के करेंगे क्या ? अग्निहोत्र से मिलने वाली ऊर्जा और पौष्टिक आहार से मिलने वाली शक्ति का वे- करेंगे क्या? एक स्त्री होती तो वे पाणिग्रहण कर घर बसाते, संतानें पैदा करते ? एक परिवार बनता, परिवार से कुटुम्ब! स्त्री के बिना समाज की कल्पना नहीं की जा सकती ? सृष्टि का मूलाधार स्त्री है, क्योंकि उसमें ब्रह्म ने गर्भधारण कर संतान पैदा करने की विलक्षण क्षमता दी है। पत्नियों के रूप में यदि इस सृष्टि के सर्जक ऋशि कश्यप को स्त्रियां नहीं मिली होती तो देव-दानव अस्तित्व में आते ही कैसे ? माता अदिति की कोख से बारह आदित्य उत्पन्न हुए, जो कालांतर में देवता कहलाए। ये हैं विवस्वान (सूर्य) अर्यमन पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र, इंद्र और उरुक्रम। इनकी दूसरी पत्नी का नाम दिति है, जिसने असुरों यानी दानवों को जन्मा! इनके दो प्रमुख पुत्र थे हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष। इनके अतिरिक्त वज्रनामा, अरुणासुर, रक्तबीज और सुरपद्म भी इन्हीं के पुत्र थे। ऋषि कश्यप की कुल सतरह पत्नियां थीं, जिनमें दक्ष प्रजापति की तेरह पुत्रियां थीं। इन्हीं पत्नियों से उत्पन्न संतानें देव व दानव कहलाईं। कालांतर में ये भरपूर वंशवृद्धि के लिए अनेक स्त्रियों से पाणिग्रहण कर उनसे उत्पन्न संतानों से सप्त-सिंधु क्षेत्र की परिधि वाले संपूर्ण आर्यावर्त में फैल गए। सरस्वती और दृष्दवती नदियों के बीच की रिक्त भूमि का ब्रह्मावर्त भी इन्हीं के अधीन था। यही जब शक्ति, धन और शस्त्र संपन्न हुए तो वैभवशाली जीवनशैली के अनुयायी हो गए। दुर्ग और आलीशान भवनों का निर्माण कर उनमें रहने लग गए। असुरों द्वारा निर्मित हरियूपिया (हड़प्पा) और मोहन-जोदड़ों का शिल्प तो वास्तुकला के अनूठे रूपकों में रूप में संपूर्ण आर्यावर्त में उदाहरण बन गए। भोग-विलास के साथ अहंकार चरम पर पहुंच गया। यही अहंकार आर्य-अनार्यों के बीच युद्ध का कारण बना। लगातार चालीस साल चले संघर्ष में इंद्र के नेतृत्व में सभी अनार्य क्षत्रप पराजित हुए, जो बचे, वह इंद्र के भय से प्राण बचाकर पश्चिम की ओर भलान (बोलन) द्वार से आर्याना को पलायन कर गए। इस अदृश्य ब्रह्म की भी विचित्र विडंबना है कि जब आर्यावर्त में प्रतिस्पर्धा और प्रतिकार समाप्त हो गए, अहिंसा और शांति का वातावरण बनने लग गया, तब प्रलय की विभीषिका ने यह तांडव रच दिया। इस तांडव में बचा रह गया, यह अभागा मनु! जो इस मृत्युलोक में सुंदर स्त्री की अभिनव कल्पना कर रहा है। मनु के मन- मष्तिस्क में रेखांकित हो रही कल्पनाओं में उर्वशी, विश्ववारा एवं सार्पराज्ञी जैसी शाश्वत छवियां उभर रही हैं, उन्हीं जैसी एक सुमधुर स्त्री के अनायास मिल जाने की कल्पना करते हुए अब मनु जिएंगे। मनु बचे हैं तो इस प्रलय के प्रभाव से उनकी तरह कोई आभागी स्त्री भी बची होगी! जो सहारे एवं आश्रय के लिए किसी पुरुष का अवलंब खोजती हुई भटक रही होगी?

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