पंकज तिवारी
मौसम के खिचपिच से, बारिस और किचकिच से, लोगों के कबड-कबड़ से दादी बहुत परेशान हो गई थी। बहुत दिनों से ददा से कह भी रही थी कि ‘चलतऽ एकाध दिना कतंउ घुमाइ लियउत, कवनउ देवथाने चलत्यऽ रचि के दर्शन-ओर्शन करित त मन आन होऽत रचिके। इहीं बहाने कुछ खाइउ-पीयइ के मिलि जात। जिभिया बेचारी तरसि गइ बाऽ कि कुछु कायदे से मिलइ गति के, उहइ रोज के दाल-भात, चोखा खात-खात जिउ उबियाइ ग बाऽ। लदेरुआ क समोसा चाट अउर फुल्का पानी लियाये त तोहंइ जिनगी सिराइ गइ जबकि जाथ्यऽ रोज बजारे। अपुना त खाइन लेत होबऽ जिउ भरि के बाकी सब जांइ उफ्फरि पड़इ। तोहंइ हमार कवनउ ख्यालइ नाइ बाऽ कि आखिर हमहूं मनई हई, हमरेउ जिउ बाऽ हमहूं कुछ खाइ-पहिरइ चाहिथी, घूमइ चाहिथी मुला तूं.. तोहंइ बस एतना ध्यान बा कि हम तोहार रोज दुआर बटोरी, गोरुअन के कोयेर कांटा के जुगाड़ करीऽ। इनारा से काढ़ि के पानी पियाई बसि। तूं हमार न सुनबऽ त सुनिल्यऽ… अब से हमहूं तोहार एक न सुनब..’- दादी लगातार बिना रुके, बिना ददा को सुने बस और बस निरंतर बोले जा रही थी जबकि ददा कबके मान गए थे और कह भी रहे थे- ‘हां महरानी, हां तोहंइ लियाइ के चलब घुमाइ देब होऽ, जहिया कहबू उहीं दिनइ चलब। कहऽ त अजुअइ नाहीं त अबहिनइ चलीऽ।’ पर दादी है कि बस.. जैसे कोई सवारी आ गई हो ऊपर। ददा गुस्से में लाल हो गए हैं कि जब मैं सब कुछ मान ही गया हूं तो फिर ये सब तमाशा क्यों..? बेचारे कुछ देर सुनते रहे, गुस्से में ही कछ बोलने को हुए कि अचानक उठे और बाहर चल दिए। दादी फिर भी चिल्लाती रही।
ददा उत्तर ओरी, गांव के मुहाने पर रमई मिसिर के दुकान पर आकर बैठ गए थे। रास्ते में दो चार लोग
मिले भी थे, पैलगी अशीष भी हुआ पर ददा के तरफ से कोई उत्तर नहीं मिला था। ददा का ऐसा रवैया तो कभी नहीं होता था। हमेशा हंसते-खेलते रहने वाले ददा आज इतने शांत कैसे..? मुसाफिर मन ही मन सोचे और ददा के पीछे हो लिए थे। ददा दुकान पर पहुंच चुके थे, जहां भीड़ अधिक थी। मुसाफिर, ददा के एकदम बगल में बैठ गए थे पर बोलचाभर अधिक होने से कुछ पूंछ नहीं पा रहे थे, डर भी था कि कहीं बमक न जाएं ददा इसलिए शांत बस ददा को निहारते रहे थे। वहां चाय-पान का बोलबाला था। भट्टी बेचारी सुबह से अपने काम पर लग जाती थी। भुड़का को हथेली पर ठोक-ठोक कर रमई मिसिर बस चाय ही बांटते रहते, पान के लिए उन्होंने अलग से अपने बहुरिया को बिठा रखा है। पान खाने वाले भी अब गांव में बहुत हो गए हैं, जिसे भी देखिए अपना मुंह लाल ही किए घूमता रहता है। आजकल गांव की अधिकतर दीवारें पीक दान बन चुकी हैं। उधर चाय उबल रही थी इधर मन ही मन ददा भी उबल रहे थे, उधर पान से लोगों के मुह के अंदर लालिमा का जमावड़ा था तो इधर ददा का दिमाग भी लाल हुए पड़ा था। ददा एकदम से तमतमा रहे थे। लोगों की बातें जैसे उनको और भी परेशान कर रही थीं, बेचारे का मन अधिक देर तक वहां भी नहीं लगा, रमई जो ददा के एकदम खास थे आज उनकी बातें भी काटने को दौड़ रही थी। ददा इधर-उधर देखे और फिर से उठ खड़े हुए। मुसाफिर भी खड़े हो गए। मुसाफिर को देखते ही ददा फिर बैठ गए। मुसाफिर भी बैठ गए। ददा कुछ कहना चाहे पर शांत ही रहे। मुसाफिर ददा को देखते रहे।
‘काऽ भ होऽ..’
‘कुछु त नाइ’
ददा उठे और बाजार की ओर बढ़ गए। मुसाफिर भी उधर ही बढ़ गए।
क्रमशः
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)
