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रोखठोक : छल छावनी के अंत की ओर…

संजय राऊत

`दिल्ली में मोदी-शाह का शासन यानी १२ साल से चल रही छल छावनी ही है। ‘जंतर-मंतर’ पर पड़ी चिंगारी से दिख रहा है कि छल छावनी का अंत करीब आ गया है। मोदी-शाह का शासन लोकतांत्रिक तरीके से नहीं, बल्कि हरामखोरी करके आया है। अगर दोबारा ऐसी हरामखोरी हुई तो ‘जंतर-मंतर’ के कॉकरोच तुम्हें मुसोलिनी बना देंगे, यह संदेश दिल्ली के आंदोलन से मिल रहा है।’

‘‘हर सड़क पर, हर गली में
हर नगर, हर गांव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं
तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग
लेकिन आग जलनी चाहिए’’

दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां आज दिल्ली की सड़कों पर सच होती दिख रही हैं। १९४२ में महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन का जीवंत उदाहरण २० जुलाई को ‘जंतर-मंतर’ से संसद मार्ग तक दिल्ली की सड़कों पर दिखाई दिया। १२ सालों से अंधभक्ति के नशे में ‘जड़’ हुआ मुर्दे जैसा देश उस दिन उमड़ पड़ा था। पुलिस की लाठियां खाते हुए, बंदूकों की नालों की परवाह न करते हुए आगे बढ़ रहा था। इस यात्रा में कई युवाओं के सिर फूटे, हड्डियां टूटीं, खून से लथपथ उनके शरीर जमीन पर गिरे, लेकिन किसी ने भी दया की भीख नहीं मांगी। ‘‘मारो, और मारो, लेकिन पीछे नहीं हटेंगे’’ यही उनकी जिद थी। आंदोलन के एक नेता सोनम वांगचुक को सरकार ने जबरदस्ती उठाकर अस्पताल के जेल में डाल दिया, फिर भी जिसकी संकल्पना से नीट पेपर लीक के खिलाफ ये आंदोलन खड़ा हुआ वो अभिजीत दीपके अपने साथियों के साथ एक ट्रक पर सवार होकर आगे बढ़ा और संसद भवन के दरवाजे पर जा धमका। मैं उस दिन दोपहर को संसद भवन से बाहर निकला। ‘शार्दूल’ गेट पर आया तब संसद के सुरक्षा गार्डों ने कहा, ‘‘बाहर नहीं जा पाएंगे। सभी दरवाजे अंदर से बंद कर दिए गए हैं। मंत्री भी बाहर नहीं जा पाएंगे। ‘जंतर-मंतर’ वाले कॉकरोचों का आंदोलन संसद के दरवाजे तक आ गया है।’’ सुरक्षा गार्ड ये बता ही रहे थे कि बाहर से नारों, गर्जनाओं, आक्रोश का शोर सुनाई दे रहा था। आंसू गैस के फूटे हुए गोले का धुआं संसद के अंदर तक आ गया और कई लोगों की आंखों के आगे अंधेरा छा गया। ये डरावना नजारा देखकर देश के महान प्रधानमंत्री भारी सुरक्षा घेरे की आड़ में छिपकर वहां से खिसक गए। इस कठिन समय में उन्हें सभी मंत्रियों, सांसदों, अधिकारियों के साथ संसद में ही रुकना चाहिए था, लेकिन युद्धभूमि से सेनापति ही भाग निकला। १३ दिसंबर २००१ को संसद पर आतंकी हमला हुआ था तब प्रधानमंत्री वाजपेयी संसद में थे और आतंकी हमला हुआ फिर भी वो पीछे के दरवाजे से नहीं भागे, ये महत्वपूर्ण है। संकट के समय नेतृत्व की परीक्षा होती है, लेकिन युद्ध हारने की कला में पारंगत हमारे प्रधानमंत्री न तो लाखों छात्रों के मोर्चे का सामना करने गए, न छात्रों के प्रतिनिधिमंडल से मिले और जैसे ही पता चला कि जनता का सैलाब संसद की तरफ आ रहा है, खुद भाग निकले। जनता ने ये महान देश कितने कमजोर हाथों में सौंप दिया है?
भाड़े के जय-जयकार
भारत के इतिहास का एक अभूतपूर्व आंदोलन दुनिया अभी देख रही है। सोनम वांगचुक ने दो केंद्रीय मंत्रियों के हाथों गर्म सूप का प्याला होंठों से लगाकर अनशन तोड़ा, लेकिन इसका ‘जंतर-मंतर’ समेत देशभर के आंदोलन पर कोई असर नहीं हुआ। उल्टा युवाओं का सैलाब बड़ी संख्या में दिल्ली में उमड़ रहा है।
अमित शाह और उनकी पुलिस ने दिल्ली में ‘मेट्रो’ सेवा बंद कर दी, फिर भी बच्चे ‘दांडी यात्रा’ की तरह ‘जंतर-मंतर’ पहुंच रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी और उनके शासन के खिलाफ यह गुस्सा है। मोदी भारत में सर्वशक्तिमान, लोकप्रिय बिल्कुल नहीं हैं। मोदी जब विदेश जाते हैं तो उनके जय-जयकार के नारे लगाने वाले लोग भाड़े के होते हैं, ये ‘जंतर-मंतर’ के आंदोलन ने साबित कर दिया। मोदी खुद अपनी ही जनता के सामने आने से घबराते हैं। वो एक कायर और संवेदनहीन शासक हैं। उन्होंने छोटे बच्चों को बेरहमी से कुचला, ये दुनिया ने देखा। इसलिए मोदी जिन्हें हीरो लगते हैं उनके दिमाग जर्जर हो गए हैं। इस आंदोलन में हीरो सोनम वांगचुक, अभिजीत दीपके, राहुल गांधी, केजरीवाल कोई नहीं हैं। हीरो वही बच्चे हैं, जो अपना घर-बार छोड़कर ‘जंतर-मंतर’ पर पहुंचे और वहीं डटे हुए हैं। सीना तानकर पुलिस की लाठियां रोज खा रहे हैं। ये हजारों आंदोलनकारी धूप-बारिश की परवाह किए बिना सड़क पर हैं। पर्दे के पीछे से इन्हें दो वक्त का खाना, पानी, दवाएं पहुंचाने वाले कई अनजान हीरो हैं। कई माता-पिताओं ने अपने बच्चे आंदोलन में भेजे। जिन माता-पिताओं ने ‘नीट पेपर लीक’ घोटाले में अपने बच्चे गंवाए, वो सभी मां-बाप दूसरों के बच्चों का भविष्य बर्बाद न हो इसलिए आंदोलन में उतरे। वो सभी माता-पिता इस आंदोलन के हीरो हैं। वांगचुक को उठाकर ले जाने के बाद सरकार इस भ्रम में थी कि आंदोलन खत्म हो गया, लेकिन सेनापति को ले जाने के बाद भी हजारों छात्र अगले दिन फिर ‘जंतर-मंतर’ पर संसद पर धावा बोलने के लिए जमा हुए। वो सभी छात्र किसी सुपर हीरो से कम नहीं हैं। उस दिन मोदी-शाह की पुलिस ने और पुलिस की वर्दी वाले गुंडों ने बच्चों को मार-मारकर अधमरा कर दिया। फिर भी तीसरे दिन अपने ताजे जख्मों के साथ ये बच्चे फिर ‘जंतर-मंतर’ पहुंच गए। वो सभी नायक हैं। गोदी मीडिया को ‘चले जाओ’ कहने वाले उन बच्चों का शुक्रिया जितना करें उतना कम है। सेठ जी की चमचागीरी में डूबे चैनलों की परवाह न करते हुए ‘यूट्यूब’ और सोशल मीडिया के जरिए इस आंदोलन की आग दुनियाभर में ले जाने वाला हर साइबर कार्यकर्ता आंदोलन का हीरो है। भाजपा के आईटी सेल की नींव उखाड़ फेंकने वाला इस आंदोलन का हर ‘लड़का’ हीरो है। इन सभी हीरो ने मिलकर भाजपा की हार और मोदी-शाह के पलायन की गाथा लिखी है। नरेंद्र मोदी अजेय नहीं हैं। २०२९ से पहले ही उनकी जालिम सत्ता खत्म हो जाएगी। उनका राज हिंदुत्व के नाम पर शुरू किया गया छल छावनी था। पिछले १२ सालों में हिंदुत्व बदनाम और कमजोर हो गया है। मोदी और उनका बेशर्म मंत्रिमंडल अब ज्यादा समय तक नहीं टिकेगा, ये साफ हो गया है।
एक मंत्री के लिए
धर्मेंद्र प्रधान जैसे एक मंत्री को बचाने के लिए मोदी-शाह ने दिल्ली की सड़कों पर सैकड़ों बच्चों के सिर फोड़ दिए। हाथ-पैर तोड़ दिए। दिल्ली पुलिस ने लड़कियों से बदसलूकी की। मोदी खुद अशिक्षित हैं और उन्होंने एक फर्जी डिग्री (एम.ए. Entire Politics) अपनी बताकर पेश की। मोदी की ये फर्जी डिग्री सामने लाने वाले गृहमंत्री अमित शाह हैं। नकली डिग्री जारी करने के लिए सबसे पहले देश के गृहमंत्री पर ही मुकदमा चलना चाहिए। खुद अमित शाह अर्धशिक्षित हैं। उनके बेटे जय शाह बिना किसी परीक्षा के भारतीय क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष बन गए। उन्हें अंग्रेजी-हिंदी के दो वाक्य भी ठीक से बोलने नहीं आते। इन सभी अशिक्षितों ने मिलकर देश की राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं में घोटाला किया। एक पूरी पीढ़ी का भविष्य बर्बाद कर दिया। अब जय शाह विदेश में हैं, सभी मंत्रियों के बच्चे विदेश में, खुद मोदी-शाह कड़े सुरक्षा घेरे में, लेकिन न्याय और अधिकारों के लिए लड़ने वाले बच्चों को वो बेरहमी से मार रहे हैं।
दुनिया में आग
‘जंतर-मंतर’ का आंदोलन देश के कोने-कोने में फैल गया। मुंबई, पटना, नागपुर, हैदराबाद, कोलकाता, पुणे, झारखंड, भुवनेश्वर में लोग बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरे। ‘विश्वगुरु’ को ये बताना जरूरी है कि लंदन, जर्मनी, न्यूयॉर्क, आयरलैंड में भी भारतीय कॉकरोचों के समर्थन में लोग सड़क पर उतर आए। यह विद्रोह मोदी-शाह की तानाशाही के खिलाफ है। इस आंदोलन का आज कोई नेता नहीं है। जब आंदोलन का कोई नेता नहीं होता और लोग सड़क पर उतर आते हैं तब क्रांति चल रही है और जालिम शासक का अंत करीब है, ऐसा मान लेना चाहिए। इस आंदोलन से एक बात और साफ हो गई कि भाजपा की सत्ता लोकतांत्रिक तरीके से आई हुई सत्ता नहीं है। ये आपराधिक तरीके से, माफिया तंत्र का इस्तेमाल करके, सभी संवैधानिक संस्थाओं को ‘ब्लैकमेल’ करके, खरीदकर हथियाई गई सत्ता है। उन्हें आज भी जनभावना की कोई कद्र नहीं है। मोदी-शाह, मुख्य न्यायाधीश, चुनाव आयोग को अभी भी लगता होगा कि लोग विरोध में चले जाएं तो भी कोई बात नहीं। हम सिस्टम को खोखला करके, सांसद-विधायक खरीदकर पुन: सत्ता पा लेंगे, लेकिन ऐसा संभव नहीं है। इटली में मुसोलिनी की सत्ता जनता ने उखाड़ फेंकी। मुसोलिनी को मारकर बीच चौराहे पर फेंक दिया। उसके शव पर इटली की जनता ने पेशाब किया। इटली की वर्तमान प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी से मुसोलिनी के अंत की कहानी भारतीय शासकों को समझनी चाहिए।

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