-२,५०० या ४००, आंकड़ों में इतना बड़ा अंतर क्यों?
नई दिल्ली
फेस रिकॉग्निशन सिस्टम एफआरएस को लेकर इस पूरे खुलासे में सबसे बड़ा सवाल संख्या का है। एक रिपोर्ट में एफआरएस के जरिए २,५०० से अधिक ‘आपराधिक पृष्ठभूमि’ वाले लोगों की पहचान का दावा किया गया है, जबकि दूसरी रिपोर्ट में २० से २४ जुलाई के बीच करीब ४०० लोगों के पुलिस रिकॉर्ड से मेल खाने की बात कही गई। इतने संवेदनशील मामले में दो अलग-अलग आंकड़े सामने आना पुलिस के दावों की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है। पुलिस को स्पष्ट करना चाहिए कि २,५०० चेहरों में कितने अलग-अलग व्यक्ति थे, कितने बार एक ही व्यक्ति स्कैन हुआ और वास्तव में कितनों के खिलाफ कोई सक्रिय मामला या वारंट था।
पुलिस रिकॉर्ड में नाम होना अपराधी होने का प्रमाण नहीं
किसी पुलिस डेटाबेस से चेहरा मेल खाने का मतलब यह नहीं कि संबंधित व्यक्ति दोषी या उपद्रवी है। पुलिस रिकॉर्ड में शिकायतकर्ता, संदिग्ध, पूर्व में हिरासत में लिया गया व्यक्ति, बरी हो चुका आरोपी या किसी पुराने मामले से जुड़ा नागरिक भी हो सकता है। इसके बावजूद ‘आपराधिक पृष्ठभूमि’ जैसे शब्दों का व्यापक इस्तेमाल हजारों प्रदर्शनकारियों को सामूहिक रूप से बदनाम करने का माध्यम बन सकता है। असली प्रश्न यह है कि पहचाने गए लोगों में कितनों को अदालत ने वास्तव में दोषी ठहराया है।
त्योहारों वाली तकनीक अब असहमति पर तैनात
एफआरएस प्रणाली का इस्तेमाल सामान्यत: गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस और बड़े संवेदनशील आयोजनों की सुरक्षा में किया जाता रहा है। जंतर-मंतर पर चार एफआरएस यूनिट तैनात कर इसे राजनीतिक और छात्र आंदोलन की निगरानी में लगाने से एक नई सीमा पार हुई है। पुलिस का कहना है कि तकनीक सामान्य प्रदर्शनकारियों के लिए नहीं, बल्कि वांछित अपराधियों, भगोड़ों और हिस्ट्रीशीटरों की पहचान के लिए है, लेकिन बिना स्वतंत्र निगरानी के यह फर्क व्यवहार में वैâसे सुनिश्चित होगा, इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं है।
‘खुफिया इनपुट’ क्या था, जनता से क्यों छिपाया गया?
पुलिस सूत्रों ने दावा किया कि उन्हें पहले से सूचना थी कि कानून-व्यवस्था बिगाड़ने वाले लोग आंदोलन में घुस सकते हैं। इसी आधार पर कुछ लोगों को रास्ते में ही एहतियाती हिरासत में लेने और निगरानी बढ़ाने की खबरें सामने आर्इं। लेकिन यह नहीं बताया गया कि इनपुट कितना विशिष्ट था, किस संगठन या समूह से खतरा था और क्या इसके समर्थन में कोई ठोस सबूत मौजूद था। केवल अस्पष्ट ‘खुफिया इनपुट’ को आधार बनाकर बड़े पैमाने की निगरानी और हिरासत को जायज ठहराना लोकतांत्रिक जवाबदेही से बचने का आसान रास्ता बन सकता है।
सरकार का फोकस समस्याओं पर या सोशल मीडिया मैनेजमेंट पर?
छात्र सड़कों पर परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता, पेपर लीक और जवाबदेही का सवाल उठा रहे हैं, लेकिन सरकार की प्राथमिकता पर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि मंत्रियों का बड़ा फोकस इंस्टाग्राम पहुंच, डिजिटल प्रचार और सरकारी उपलब्धियों का नैरेटिव बनाने पर है, जबकि युवाओं की मांगें बातचीत और आश्वासनों के बीच लटकी रहती हैं, तो असंतोष और गहरा होगा। सरकार को मंत्रियों की सोशल मीडिया लोकप्रियता नहीं, छात्रों के भविष्य और जनहित के कामकाज को अपनी असली कसौटी बनाना चाहिए।
आंदोलन को बदनाम करने की पटकथा तो नहीं?
२,५०० लोगों के पुलिस रिकॉर्ड में होने का दावा आंदोलन की मूल मांग, पेपर लीक, परीक्षा व्यवस्था और शिक्षा मंत्री की जवाबदेही से ध्यान हटाकर पूरी भीड़ को संदेह के घेरे में खड़ा कर सकता है। सवाल यह भी है कि क्या कुछ व्यक्तियों की कथित पृष्ठभूमि के आधार पर हजारों छात्रों के शांतिपूर्ण आंदोलन को ‘अपराधियों की घुसपैठ’ वाला प्रदर्शन साबित करने की जमीन तैयार की जा रही है। किसी भी व्यक्तिगत अपराध की जांच होनी चाहिए, लेकिन उसकी आड़ में पूरे आंदोलन का चरित्रहनन नहीं किया जा सकता।
आज निगरानी, कल कार्रवाई की सूची?
एफआरएस के जरिए पहचान के बाद पुलिस इन चेहरों का क्या करेगी, यह सबसे गंभीर प्रश्न है। क्या केवल वांछित आरोपियों पर कार्रवाई होगी या प्रदर्शन में मौजूदगी के आधार पर बाद में नोटिस, पूछताछ और मुकदमों का सिलसिला शुरू किया जाएगा? यदि वैâमरों का उद्देश्य तत्काल सुरक्षा था, तो डेटा का इस्तेमाल उसी घटना तक सीमित होना चाहिए। भविष्य के आंदोलनों को कुचलने के लिए इस सूची का इस्तेमाल हुआ तो तकनीक सुरक्षा उपकरण नहीं, राजनीतिक नियंत्रण का हथियार बन जाएगी।
