प्रो. दयानंद तिवारी
‘गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर:।
गुरु: साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नम:’
भारतीय संस्कृति में यदि किसी संबंध को ईश्वर से भी श्रेष्ठ माना गया है, तो वह गुरु और शिष्य का संबंध है। माता जीवन देती है, पिता पालन-पोषण करता है, परंतु गुरु मनुष्य को ज्ञान, विवेक और आत्मबोध का प्रकाश देकर उसके जीवन को सार्थक बनाता है। इसी गुरु-तत्त्व के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और समर्पण व्यक्त करने का पावन पर्व है गुरु पूर्णिमा।
आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-परंपरा का महापर्व है। यह दिन महर्षि वेदव्यास की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। वेदों के विभाजन, महाभारत, अठारह पुराणों तथा ब्रह्मसूत्र जैसे अमूल्य ग्रंथों की रचना कर उन्होंने मानवता को ऐसा ज्ञान-संपदा प्रदान की, जिसका प्रकाश युगों-युगों तक मानव सभ्यता का मार्गदर्शन करता रहेगा। इसी कारण इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।
गुरु पूर्णिमा हमें यह स्मरण कराती है कि ज्ञान केवल पुस्तकों से प्राप्त नहीं होता, बल्कि वह गुरु के सान्निध्य, उनके जीवन, आचरण और अनुभव से आत्मा में उतरता है। गुरु केवल शिक्षा नहीं देता, वह जीवन जीने की कला सिखाता है। वह व्यक्ति के भीतर छिपी हुई संभावनाओं को पहचानकर उन्हें विकसित करता है। भारतीय दर्शन में गुरु को अज्ञान के अंधकार को दूर करने वाला प्रकाश-स्तंभ माना गया है। `गु’ का अर्थ अंधकार और `रु’ का अर्थ उसका नाश करने वाला है। अत: गुरु वह है, जो अज्ञान का नाश कर ज्ञान का दीप प्रज्वलित करता है।
उपनिषदों में स्पष्ट कहा गया है कि `तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्।’
अर्थात परम ज्ञान की प्राप्ति के लिए गुरु की शरण में जाना आवश्यक है। यही कारण है कि श्रीराम ने महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र से शिक्षा प्राप्त की, श्रीकृष्ण ने संदीपनि ऋषि को अपना गुरु बनाया और छत्रपति शिवाजी महाराज ने समर्थ रामदास को अपना आध्यात्मिक मार्गदर्शक स्वीकार किया। इन महान व्यक्तित्वों की सफलता के पीछे गुरु की प्रेरणा और संस्कार ही प्रमुख आधार थे।
स्वामी शिवानंद सरस्वती ने गुरु पूर्णिमा के महत्व का वर्णन करते हुए कहा है कि यह केवल पूजा का दिन नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण और साधना का शुभारंभ है। जिस प्रकार वर्षा की पहली फुहार सूखी धरती में नवजीवन भर देती है, उसी प्रकार गुरु की कृपा मनुष्य के अंत:करण में नई चेतना और नई ऊर्जा का संचार करती है। यह दिन संकल्प लेने का है कि हम अपने जीवन में केवल ज्ञान एकत्र नहीं करेंगे, बल्कि उसे आचरण में भी उतारेंगे। आज का युग सूचना का युग है, परंतु सूचना और ज्ञान में अंतर है। इंटरनेट हमें जानकारी दे सकता है, पर विवेक नहीं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता उत्तर दे सकती है, पर जीवन का मार्ग नहीं दिखा सकती। गुरु का स्पर्श, उसका अनुभव, उसका आशीर्वाद और उसका चरित्र ही वह शक्ति है, जो व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण करता है। इसलिए आधुनिक तकनीक चाहे जितनी विकसित हो जाए, गुरु का स्थान कभी कम नहीं हो सकता।
गुरु पूर्णिमा हमें यह भी सिखाती है कि संपूर्ण प्रकृति भी हमारी गुरु है। धरती धैर्य सिखाती है, वृक्ष त्याग का पाठ पढ़ाते हैं, नदियां निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं, पर्वत दृढ़ता का संदेश देते हैं और सूर्य बिना किसी भेदभाव के सबको प्रकाश देकर निष्काम कर्म की शिक्षा देता है। जो सीखने की दृष्टि विकसित कर लेता है, उसके लिए संपूर्ण सृष्टि ही गुरु बन जाती है। यह पर्व केवल गुरु का सम्मान करने तक सीमित नहीं है; यह शिष्य को भी अपने कर्तव्यों का स्मरण कराता है। सच्चा शिष्य वही है, जो विनम्र हो, अनुशासित हो, प्रश्न पूछे, जिज्ञासु रहे और गुरु द्वारा बताए गए मार्ग पर चलने का साहस रखे। केवल चरण स्पर्श कर लेना गुरु-भक्ति नहीं है; गुरु की शिक्षाओं को जीवन में उतारना ही वास्तविक श्रद्धांजलि है।
आज समाज अनेक प्रकार के संकटों से गुजर रहा है-नैतिक मूल्यों का ह्रास, परिवारों का विघटन, बढ़ती प्रतिस्पर्धा, तनाव और स्वार्थ। इन परिस्थितियों में गुरु पूर्णिमा का संदेश पहले से अधिक प्रासंगिक हो जाता है। यदि समाज को संस्कारवान, संवेदनशील और उत्तरदायी बनाना है, तो हमें गुरु-शिष्य परंपरा को पुन: जीवंत करना होगा। विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा केवल परीक्षा तक सीमित न रहकर चरित्र निर्माण का माध्यम बने-यही गुरु पूर्णिमा का वास्तविक संदेश है।
संत कबीर ने गुरु के महत्व को अत्यंत सरल शब्दों में व्यक्त किया है।
`गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।’
यह दोहा स्पष्ट करता है कि गुरु ही वह माध्यम है, जो मनुष्य को ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग दिखाता है। गुरु बिना ज्ञान अधूरा है और ज्ञान बिना जीवन अधूरा।
गुरु पूर्णिमा आत्मशुद्धि, आत्मचिंतन और आत्मविकास का पर्व है। इस दिन हमें अपने जीवन में विनम्रता, सेवा, संयम, अध्ययन, साधना और सत्कर्म का नया संकल्प लेना चाहिए। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने गुरु के आदर्शों को जीवन में उतार ले, तो परिवार में प्रेम, समाज में सद्भाव और राष्ट्र में नैतिक शक्ति का नया प्रकाश फैल सकता है।
अंतत: गुरु पूर्णिमा हमें यही संदेश देती है कि सच्चा गुरु केवल बाहर नहीं, हमारे अंत:करण में भी निवास करता है। जब मन निर्मल होता है, विचार पवित्र होते हैं और कर्म निष्काम होते हैं, तब गुरु-कृपा स्वयं जीवन का मार्ग प्रकाशित कर देती है।
आइए, इस गुरु पूर्णिमा पर हम अपने सभी गुरुओं माता-पिता, शिक्षकों, आध्यात्मिक मार्गदर्शकों और जीवन में प्रेरणा देने वाले प्रत्येक व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें तथा यह संकल्प लें कि ज्ञान को केवल अर्जित नहीं करेंगे, बल्कि उसे अपने जीवन और समाज के कल्याण के लिए समर्पित करेंगे।
गुरु का दीप जले तो जीवन का तम मिट जाता है, ज्ञान का एक कण भी भाग्य नया लिख जाता है।
श्रद्धा से झुक जाए जो, वह ऊंचाइयां पा लेता है,
गुरु-कृपा का स्पर्श मिले तो मानव देव बन जाता है।
