अनिल मिश्र / पटना
भारत के प्रथम नोबेल पुरस्कार विजेता गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर द्वारा रचित प्रसिद्ध कहानी ‘काबुलीवाला’ मानवीय संवेदना, त्याग ,कर्तव्यबोध तथा वात्सल्य प्रेम की मार्मिक प्रस्तुति है।इस बीच बिहार प्रदेश के गया जिला अंतर्गत टिकारी नगर मुख्यालय में स्थित टाउन मध्य विद्यालय परिसर में आयोजित ‘कहानी विद कॉफी’ कार्यक्रम की 23 वीं कड़ी में कहानी ‘काबुलीवाला’ के पाठ एवं चर्चा के दौरान वक्ताओं ने इन पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। इस कार्यक्रम की शुरुआत विद्यालय की छात्रा सदफ द्वारा कहानी पाठ से हुई। विद्यालय के प्रधानाचार्य रिन्टू कुमार ने कहा कि काबुलीवाला कहानी के माध्यम से लेखक ने मानवीय संवेदना और वात्सल्य प्रेम को बहुत ही बेहतर तरीके से उकेरा है।
खैरा विद्यालय के शिक्षक पवन कुमार सिंह ने कहा कि यह कहानी अफगानिस्तान के सूखे मेवे बेचने वाले ‘रहमत’ और कोलकाता की पांच वर्षीय बच्ची ‘मिनी’ के बीच की आत्मीय मित्रता को दर्शाती है। यह कहानी बताती है कि पितृत्व प्रेम भौगोलिक और सामाजिक सीमाओं से परे होते हैं। नगर के लोकप्रिय शिक्षाविद् प्रो. राजन ने विस्तार से कहानी को समझाया और बताया कि काबुल से आनेवाले लोगों को काबुलीवाला कहा जाता था। रविंद्र नाथ ठाकुर ने बच्चों को समझ में आने वाली इस कथा के माध्यम से पिता का अपनी बेटी के प्रेम को बड़े ही सजीव तरह से उकेरा है।
इस कहानी में लेखक की पांच साल की बेटी मिनी की मुलाकात गली में सूखे मेवे बेचने वाले काबुलीवाले, रहमत से होती है। रहमत उसे बादाम और किशमिश देता है और वे- दोनों खूब हँसी-मज़ाक करते हैं। रहमत को मिनी में अपनी खुद की बेटी की छवि दिखाई देती है, जिसे वह अपने देश अफगानिस्तान में छोड़ आया है। एक दिन, रहमत एक ग्राहक से उधार लिए पैसों को लेकर बहस करता है और गुस्से में उसे चाकू मार देता है। इस अपराध के लिए उसे जेल हो जाती है। जब जेल से सज़ा काटकर रहमत लेखक के घर आता है, तो उसी दिन मिनी की शादी की तैयारियाँ चल रही हैं। लेखक उसकी भावना को समझते हुए अपनी बेटी मिनी को बाहर बुलाते है।
मिनी अब एक दुल्हन के रूप में सजी हुई है, और वह अपने काबुलीवाले को भूल चुकी है। मिनी को देखकर और यह सोचकर कि उसकी अपनी बेटी भी अब इतनी ही बड़ी हो गई होगी, रहमत की आँखों में आँसू आ जाते हैं। लेखक का दिल पिघल जाता है और वह एक पिता के दर्द को समझकर, अपनी बेटी की शादी के खर्चों में कटौती कर रहमत को कुछ पैसे देकर वापस उसके देश भेज देता है ताकि वह अपनी बेटी से मिल सके।इस बीच सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु शेखर ने कहा कि यह कहानी भावना और वात्सल्य प्रेम की कहानी है। आयोजक और कार्यक्रम का संचालन कर रहे संजय अथर्व ने कहा कि इस आयोजन का उद्वेश्य साहित्य से बच्चों को जोड़ना है। वहीं रामेश्वर उच्च विद्यालय बेलागंज के प्राचार्य अबरार आलम ने कहा कि आगामी कड़ी का आयोजन उनके विद्यालय में किया जाएगा।सेवानिवृत प्राचार्य शिव शंकर शर्मा ने कहा कि इस आयोजन को सभी विद्यालय में आयोजित करना चाहिए। शोधार्थी मनीष कुमार ने कहानी के हर पहलू को विस्तार से समझाया। वहीं खैरा हाई स्कूल में कार्यरत शिक्षक बृजेश कुमार ने कहा कि ऐसे कार्यक्रम रेगिस्तान में ठंडी हवा के झोंके जैसा अहसास देते हैं, जबकि मीडियाकर्मी नारायण मिश्रा ने नोबल पुरस्कार की महत्ता पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम में विद्यालय के कई शिक्षक गण एवं छात्राएं शामिल हुए। इस कार्यक्रम में कई श्रोता ऑनलाइन माध्यम से भी जुड़े और अपनी प्रतिक्रियाएं साझा की। कार्यक्रम की अध्यक्षता रिंटू कुमार और धन्यवाद ज्ञापन बी पी एन ग्लोबल स्कूल के निदेशक नामित राजा ने किया।
