मेरे हमसफर, मेरे हमराही
तेरे साथ की कुछ मीठी बातें,
अंधेरी स्याह कठिन रातें,
मेरे हमराही यूं ही गुजर जाएंगी।
चांद और जुगनुओं की रोशनियां,
या हमारे बीच की खामोशियां,
मौन अधर पर कहती कुछ आंखें,
खिलते हुए कमल की मृदु पांखें
मेरे हमराही यूं ही संवर जाएंगी।
तुम्हारे ख्वाब की परछाइयां,
बज उठती है मधुरिम शहनाईयां
और हमारे प्रेग की स्मृतियां,
दिल में उतर आएंगी।
ये पल, ये दिन, ये रातें
मेरे हमराही यूं ही गुजर जाएंगी।
दिन, तारीख लौटकर ना आएंगी,
जाने कब हमारी सांसे थम जाएंगी,
दे जाएंगे मुहब्बत की कुछ निशानियां
मुहब्बत के इस चमन में खुशबू से बिखर जाएंगे
ये पल, ये रातें, ये दिन यूं ही गुजर जाएंगे।
-नीरजा तिवारी
