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रुख-ए-सियासत: जब बच्चों की आंखों में सवाल हो और सत्ता के हाथ में अहंकार की लाठी!

तौसीफ कुरैशी

सत्ता के अहंकार की असली परीक्षा चुनाव के दिन नहीं होती, बल्कि उस दिन होती है, जब सड़क पर खड़ा नागरिक अपनी बात कहने का अधिकार मांगता है। जंतर-मंतर और संसद की ओर बढ़ते युवाओं के बीच एक मासूम बच्ची की आंखों से बहते आंसुओं ने ऐसा सवाल खड़ा कर दिया, जिसका जवाब केवल सरकार ही नहीं, पूरे समाज को देना होगा ‘अगर आपके अपने बच्चे होते, तो क्या आप उनके साथ भी ऐसा ही व्यवहार करते?’ यह सवाल किसी राजनीतिक दल से अधिक हमारी संवेदनाओं पर दस्तक देता है। लोकतंत्र में असहमति अपराध नहीं होती। विरोध प्रदर्शन संविधान प्रदत्त अधिकार है। लेकिन जब संवाद की जगह लाठियां और आंसू गैस ले लेते हैं, तब लोकतंत्र की आत्मा घायल होती है। किसी भी सरकार की ताकत इस बात से नहीं मापी जाती कि वह विरोध को कितनी कठोरता से दबा सकती है, बल्कि इससे कि वह विरोध की आवाज कितने धैर्य से सुन सकती है। देश का युवा आज रोजगार, शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं, महंगाई और भविष्य की अनिश्चितताओं से जूझ रहा है। ऐसे समय में यदि उसकी आवाज को सुरक्षा व्यवस्था के बल पर रोकने की कोशिश होती है, तो यह केवल एक प्रदर्शन का दमन नहीं, बल्कि विश्वास के संकट को और गहरा करता है। इतिहास गवाह है कि युवाओं की आकांक्षाओं को कभी डंडों से नहीं दबाया जा सका। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की अमर पंक्तियां आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती हैं ‘सदियों की ठंडी-बुझी राख सुगबुगा उठी है… सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।’ यह केवल सत्ता परिवर्तन का उद्घोष नहीं, बल्कि जनमत के सम्मान का संदेश है। हालांकि, युवाओं का विरोध विपक्ष के पीछे एकजुट न हो इसलिए सीजेपी का गठन मोदी सरकार द्वारा कराया गया यह भी चर्चाओं का हिस्सा है, क्योंकि नेताप्रतिपक्ष राहुल गांधी लगातार छात्र-छात्राओं के बीच ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम कर रहे हैं उससे सरकार घबराई हुई है। लोकतंत्र में सिंहासन जनता का होता है और सरकारें उसकी प्रतिनिधि मात्र होती हैं। दुष्यंत कुमार की कविता भी इसी बेचैनी को स्वर देती है। जब वे लिखते हैं कि ‘हर सड़क, हर गली, हर नगर, हर गांव में…’ तो उसका आशय यह है कि समाज की चेतना को अनदेखा नहीं किया जा सकता। जब हजारों युवा तिरंगा हाथ में लेकर अपनी बात कहने निकलते हैं, तो उन्हें संदेह की दृष्टि से नहीं, लोकतंत्र के सहभागी के रूप में देखा जाना चाहिए।
किसी भी सरकार के लिए यह आत्ममंथन का समय होता है कि आखिर वह कौन-सी परिस्थितियां हैं, जिन्होंने युवाओं को सड़कों पर उतरने के लिए विवश किया। लोकतंत्र की मजबूती विरोध की आवाज को सुनने में है, उसे कुचलने में नहीं। सत्ता का अहंकार क्षणिक हो सकता है, लेकिन जनता की स्मृति लंबी होती है। आखिर में सवाल फिर वहीं लौटता है यदि सड़क पर खड़ी वह रोती हुई बच्ची आपकी अपनी होती, तो क्या तब भी लाठी पहले चलती और संवाद बाद में होता? यही प्रश्न आज भारतीय लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ी कसौटी बनकर खड़ा है। लोकतंत्र की असली जीत तब होगी, जब सत्ता जनता की आवाज को दुश्मन नहीं, अपनी जिम्मेदारी समझे। सत्यमेव जयते

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