मुख्यपृष्ठस्तंभप्रणवाक्षर :  आंदोलन जो नेतृत्व से आगे बढ़ गया

प्रणवाक्षर :  आंदोलन जो नेतृत्व से आगे बढ़ गया

प्रणव प्रियदर्शी

नई दिल्ली में सोमवार को संसद मार्च का आह्वान भले कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने किया था, इसमें आम लोगों के अलग-अलग हिस्सों की व्यापक भागीदारी, उनके विरोध की शिद्दत, नारों की सटीकता और आक्रामकता तथा राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया को ध्यान में रखें तो यह साफ हो जाता है कि आंदोलन इसके नेतृत्व से आगे बढ़ गया है।
राजनीति से दूरी
इस आंदोलन की शुरुआत चाहे कितनी भी धीमी रही हो, लेकिन दो बातें बिल्कुल साफ हैं। एक तो यह कि इसे नेतृत्वविहीन आंदोलन नहीं कहा जा सकता। दूसरी बात यह कि पारंपरिक विपक्षी दलों द्वारा उन्हीं मुद्दों पर किए जा रहे विरोध प्रदर्शनों से अलग पहचान बनाने पर इसका जोर शुरू से था। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने यह साफ करने में भी कोई झिझक नहीं दिखाई कि वे इस आंदोलन को राजनीतिक दलों और नेताओं से अलग रखना चाहते हैं।
भागीदारी
हालांकि, इसके बावजूद आम लोगों की कम भागीदारी से चिंतित आंदोलन समर्थकों की ओर से यह शिकायत की जाने लगी कि विरोधी दलों के नेता समर्थन में क्यों नहीं आ रहे, राहुल गांधी जंतर-मंतर पर पहुंचकर अनशनरत सोनम वांगचुक और अन्य लोगों से क्यों नहीं मिलते वगैरह-वगैरह। यहां तक कि खुद वांगचुक भी यह कहने से खुद को नहीं रोक पाए कि अगर राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेता उनके समर्थन में आगे नहीं आते तो यह उनका छोटापन होगा।
आखिर फूटा गुस्सा
ध्यान रहे, अनशन के तीसरे सप्ताह में प्रवेश करने के बाद धीरे-धीरे इंडिया गठबंधन से जुड़े नेता वांगचुक के समर्थन में बयान देने लगे थे, लेकिन आम लोगों की भागीदारी में कोई बड़ा फर्क तब तक नहीं दिखा, जब तक कि वांगचुक जंतर-मंतर पर बैठे रहे। जब दिल्ली पुलिस उन्हें अनशन स्थल से जबरन उठा ले गई तब जैसे लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। उन्हें लगा कि यह सरकार न केवल नीट पेपर लीक जैसे गंभीर मामले को अनदेखा कर रही है, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की लगातार तेज हो रही मांग को अनसुना कर रही है, बल्कि नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध के लोकतांत्रिक अधिकार को भी कुचलने पर उतर आई है।
बढ़ गया दायरा
उसके बाद न केवल देशभर से युवाओं, नौजवानों के जंतर-मंतर आने का सिलसिला तेज हो गया बल्कि इनके अलग-अलग स्वरों ने आंदोलन के मुद्दों का दायरा भी बढ़ा दिया। न केवल पूरी शिक्षा व्यवस्था के लगभग ध्वस्त हो जाने का मसला सामने आने लगा और बढ़ती बेरोजगारी का सवाल तथा नागरिकों के लिए सम्मानपूर्ण जीवन सुनिश्चित करने की मांग भी गूंजने लगी। यूपीएससी की तैयारी कर रही एक लड़की ने तो यहां तक कह दिया कि कोई आंदोलन अगर खुद को गैरराजनीतिक बताना चाहता है तो यह उसकी समझदारी नहीं, बल्कि बेवकूफी है।
लोकतांत्रिक चेतना
इन सबका परिणाम यह रहा कि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस समेत तमाम विरोधी दलों के नेताओं ने, आंदोलन के नेतृत्व के प्रति अपने संदेहों के बावजूद आंदोलन का समर्थन किया। सोमवार को संसद के अंदर भी आंदोलन के सवाल जोरदार ढंग से गूंजे। आंदोलन अब आगे कैसा मोड़ लेगा और सरकार पर कितना दबाव बना पाएगा, यह तो देखने वाली बात होगी, लेकिन इसने इतना साबित कर दिया है कि देश में लोकतांत्रिक चेतना की जड़ें काफी गहरी हैं और इनसे खिलवाड़ करने का दुस्साहस किसी भी सरकार को आखिरकार बहुत भारी पड़ेगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक मामलों के जानकार हैं)

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