प्रणव प्रियदर्शी / नई दिल्ली
जंतर-मंतर पर माहौल तो रविवार रात से ही गरमाने लगा था। शाम करीब आठ बजे एनसीआर में रहने वाले एक मित्र का फोन आया। उन्होंने कहा, मैं नौ बजे निकलूंगा, चलिए जंतर-मंतर का एक चक्कर लगा ही आते हैं।’
मैंने पूछा, ‘क्यों?’
उनका जवाब था, रात नौ बजे के बाद वहां भीड़ कम हो जाती है। इस सरकार का कोई भरोसा नहीं है। कहीं रात में ही फोर्स भेजकर आंदोलनकारियों को हटाने का पैâसला न कर ले।’
मित्र की बातों में एक आम दिल्लीवासी की चिंता झलक रही थी। रात में जंतर-मंतर पहुंचकर, एक तरह से आंदोलनकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले वह अकेले नहीं थे। दिल्ली ही नहीं, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों से भी बड़ी संख्या में छात्र, युवा और कार्यकर्ता रात में ही जंतर-मंतर पहुंच गए थे। उनमें से ज्यादातर ने फुटपाथ पर ही रात बिताई।
एंट्री प्वाइंट बंद…
सुबह करीब दस बजे मेट्रो यात्रा के दौरान ही संकेत मिलने लगे थे कि दिल्ली में सब कुछ सामान्य नहीं रहने वाला। व्हाट्सऐप संदेशों से पता चल रहा था कि जंतर-मंतर के आसपास के कई मेट्रो स्टेशनों पर यात्रियों को उतरने की अनुमति नहीं दी जा रही है। मेरे साथ कुछ पत्रकार मित्र भी थे। हमने मंडी हाउस मेट्रो स्टेशन, जो जंतर-मंतर से अपेक्षाकृत नजदीक है, वहीं उतरने का पैâसला किया, ताकि आगे मेट्रो स्टेशन के गेट बंद मिलने पर अतिरिक्त दूरी तय न करनी पड़े। ऑटोचालकों का कहना था कि पुलिस ने जंतर-मंतर के आसपास के अधिकांश प्रवेश मार्ग बंद कर दिए हैं। हालांकि, वे यह भी बता रहे थे कि किन रास्तों से जंतर-मंतर के करीब तक पहुंचा जा सकता है और वहां से पैदल वैâसे जाया जा सकता है।
संसद की ओर…
जब हम जंतर-मंतर पहुंचे तो वहां जनसैलाब उमड़ पड़ा था। अभिजीत दीपके संसद भवन की ओर कूच कर चुके थे। नेहा और अन्य अनशनरत आंदोलनकारी एआईएसए के स्टॉल पर मौजूद थे, लेकिन लगातार बढ़ती भीड़ से बार-बार अपील की जा रही थी कि वे संसद भवन की ओर बढ़ें। चारों ओर भारी संख्या में पुलिस बल तैनात था। इसके बावजूद लोगों की विशाल भीड़, जिसका कोई ओर-छोर नजर नहीं आ रहा था, धीरे-धीरे संसद भवन की ओर बढ़ रही थी। जगह-जगह छोटे-छोटे समूहों में लोग भाषण भी दे रहे थे।
संचारबंदी…
भीड़ में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए लोगों को उनकी भाषा, वेशभूषा और हाव-भाव से आसानी से पहचाना जा सकता था। तभी सामने से वरिष्ठ पत्रकार निखिल वागले आते दिखाई दिए। उनके साथ युवराज मोहिते भी थे। दोनों इस आंदोलन की कवरेज के लिए तीन दिन पहले ही दिल्ली पहुंचे थे। वहीं बिहार से आर्इं टीना शुभमूर्ति भी मिलीं। उनसे पता चला कि उनके पिता, प्रसिद्ध गांधीवादी कुमार शुभमूर्ति भी वहां मौजूद हैं, लेकिन भीड़ इतनी अधिक थी कि आसपास मौजूद व्यक्ति तक का पता लगाना मुश्किल हो रहा था। इंटरनेट और मोबाइल फोन भी ठीक से काम नहीं कर रहे थे। स्थिति कुछ-कुछ कुंभ मेले जैसी थी, जो एक बार बिछड़ा, उसका दोबारा मिलना मुश्किल था।
ऑल इज नॉट वेल…
एक अन्य पोस्टर पर लिखा था, ऑल इज नॉट वेल, ब्रो। एक बड़े पोस्टर पर लिखा था, एजुकेशन ने रिजाइन कर दिया, मिनिस्टर रह गया। आखिर में अंग्रेजी में लिखा एक पोस्टर नजर आया, जिस पर लिखा था, If I die, donate my middle finger to the education system. यानी, अगर मैं मर जाऊं, तो मेरी बीच वाली उंगली शिक्षा व्यवस्था को दान कर दी जाए। पोस्टर में बीच वाली उंगली का प्रतीक भी दर्शाया गया था।
संयम और नारे…
अच्छी बात यह रही कि इस सूचना के बावजूद भीड़ ने संयम बनाए रखा। लोग धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहे। इस दौरान कई दिलचस्प और रचनात्मक नारे तथा पोस्टर देखने को मिले, जो राजनीतिक दलों के पारंपरिक नारों से अलग थे। मिसाल के तौर पर दो पोस्टरों को जोड़कर एक संदेश बनाया गया था। पहले पोस्टर पर लिखा था। मोदी सरकार द्वारा किए गए अच्छे कार्य। इसके बाद तीर के निशान से दूसरे पोस्टर की ओर संकेत किया गया था, जहां … के अलावा कुछ नहीं लिखा था।
टियर गैस और लाठीचार्ज
इसी बीच सामने से आते कुछ लोगों ने सचेत किया कि रूमाल भिगोकर चेहरे पर रख लें, क्योंकि आगे पुलिस आंसू गैस के गोले छोड़ रही है। कुछ ही देर में धुएं की गंध महसूस होने लगी और आंखों में जलन भी शुरू हो गई। पसीने और हल्की बारिश से रूमाल पहले ही थोड़ा भीग चुका था। उसे नाक और मुंह पर रखने से कुछ राहत मिली। थोड़ी देर बाद अफरातफरी का माहौल बन गया। पता चला कि आगे पुलिस ने लाठीचार्ज शुरू कर दिया है। आखिर लाठीचार्ज की जरूरत क्यों पड़ी, यह समझ में नहीं आया। छात्रों का रवैया ऐसा बिल्कुल नहीं दिख रहा था कि ऐसी कार्रवाई की नौबत आती।
