मुख्यपृष्ठस्तंभअभिलाषा पूर्ति करती है विष्णु भक्ति

अभिलाषा पूर्ति करती है विष्णु भक्ति

ईश्वर से प्रार्थना, दुआओं, आशीर्वाद या पूजा-कर्मों में हर कहीं खुशियों को पाने की गहरी चाहत होती है। इस तरह इंसान जागते हुए ही आनंद और रस नहीं चाहता, बल्कि सुकून और चैन से भरी नींद भी सुख की कामना में शामिल होती है। लेकिन सच यही है कि चैन की नींद तभी संभव है, जब जागते हुए संयम से भरा जीवन गुजारा जाए।
हिंदू धर्मशास्त्रों में प्राचीन ऋषि-मुनियों द्वारा बताए गए व्रतों और त्योहारों के साथ सुख के लिए संयमित और संतुलित जीवनशैली अपनाने के अनेक सबक और उपाय बताए गए हैं। अगले चार माह में सुख की हर चाहत पूरी करने के लिए विशेष रूप से भगवान विष्णु की भक्ति करें।
आषाढ़ शुक्ल एकादशी यानी देवशयनी एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देवउठनी एकादशी के बीच के चार माह चातुर्मास के रूप में प्रसिद्ध हैं। इस अवधि में धर्म और संयम को अपनाकर जीवन में रस, आनंद और सुख बनाए रखने का संदेश दिया गया है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ये दोनों तिथियां भगवान विष्णु के शयन और जागरण की घड़ी मानी जाती हैं। माना जाता है कि देवशयनी एकादशी से अगले चार माह तक भगवान विष्णु शेषनाग की शैया पर शयन करने के लिए क्षीरसागर चले जाते हैं। इसलिए इस दौरान गृह प्रवेश, विवाह, देवताओं की प्राण-प्रतिष्ठा, यज्ञ-हवन और विभिन्न संस्कार जैसे अनेक मांगलिक कार्य नहीं किए जाते।
प्रतीकात्मक रूप में भगवान विष्णु का यह शयन मौसम के बदलाव के दौरान स्वास्थ्य और व्यावहारिक जीवन को सुखद बनाने के लिए जीवनशैली को साधने की प्रेरणा देता है, विशेष रूप से धर्माचरण के माध्यम से।
इसी शुभ काल में माधुर्य अर्थात आनंद के सात्विक स्वरूप भगवान विष्णु के नाम-स्मरण का विशेष महत्व बताया गया है। भगवान विष्णु और उनके अवतार जगत के सुख और कल्याण का कारण बने हैं। इनमें श्रीकृष्ण और श्रीराम के कर्म तथा मर्यादा के सूत्र हर काल में सुखी जीवन के श्रेष्ठ उपाय माने गए हैं।
चातुर्मास की अवधि में मन, वचन और व्यवहार को साधने के लिए भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराम के रूप में भगवान विष्णु के ध्यान का यह सरल मंत्र बताया गया है। इसका अकेले अथवा परिवार और इष्ट-मित्रों के साथ बैठकर श्रद्धापूर्वक जप करने से तनाव, दबाव और परेशानियों से मुक्ति का अनुभव किया जा सकता है।
चातुर्मास के दौरान यथासंभव प्रतिदिन भगवान विष्णु को गंध, चंदन, पीले फूल और नैवेद्य अर्पित करें। इसके बाद सुगंधित धूप-दीप जलाकर इस मंत्र का जप करें-
अच्युतं केशवं रामनारायणम्।
कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम्।।
श्रीधरं माधवं गोपिका वल्लभम्।
जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे।।
मंत्र-जप या भजन के बाद भगवान विष्णु की आरती करें और प्रसाद अवश्य ग्रहण करें।

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