अजय भट्टाचार्य
१९९० के दशक की शुरुआत में कश्मीर घाटी में आतंकवाद अपने चरम पर था। अलगाववादियों द्वारा श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराने की खुली चुनौती दी गई थी। इस चुनौती को स्वीकार करते हुए, अभाविप के बैनरतले लगभग १० हजार छात्रों ने ‘जहां हुआ तिरंगे का अपमान, वहीं करेंगे उसका सम्मान’ और ‘चलो कश्मीर’ के नारे के साथ देशभर से कश्मीर की ओर कूच किया था। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य लाल चौक पर तिरंगा फहराना था। शांतिपूर्ण तरीके से कश्मीर की ओर बढ़ रहे हजारों कार्यकर्ताओं को सुरक्षा बलों द्वारा उधमपुर के पास धारा १४४ के उल्लंघन के आरोप में गिरफ्तार कर जम्मू की कामचलाऊ जेलों में रखा गया। रिहा होने के बाद यह सभी दिल्ली में उस समय के प्रधानमंत्री आवास के सामने धरने पर बैठ गए। प्रधानमंत्री के प्रतिनिधियों ने आंदोलनकारियों से बात कर भरोसा दिलाया कि वे इस पर जरूर काम करेंगे। धरना खत्म हुआ और सब अपने-अपने घर लौट गए। देश भर में जम्मू से उधमपुर जाते समय और बाद में दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास के सामने प्रदर्शन करते समय तक उन पर पुलिस ने कभी लाठियों से हमला नहीं किया, आंसू गैस नहीं छोड़ी, न ही किसी तरह का बलप्रयोग या जबरदस्ती की। किसी ने न उनको ‘देशद्रोही’ कहा। न यह कहा कि उन्हें विदेश से ‘फंडिंग’ मिल रही है। सबका मानना था कि वे छात्र हैं; वे देश के लिए जो कुछ भी करना चाहते हैं, कर रहे हैं। मीडिया ने भी उन्हें कोई तमगा नहीं दिया था। तब के प्रधानमंत्री अपने घर के सामने जमा छात्रों को देखकर डर के मारे घर से नहीं भागे। बल्कि उन्होंने विचार सुनने के लिए अपने प्रतिनिधि भेजे और उस पर काम करने को कहा।
आज छात्र आंदोलन के बारे में अभाविप और उसका पितृ संगठन मौन है। बल्कि सरकार की सरपरस्ती में पुलिस के साथ मिलकर छात्रों को पीट रहा है।
जब खुद आंदोलन करते थे, तब सरकार से लोकतांत्रिक व्यवहार मिलता था। अब वही लोग किसी भी तरह के शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों को लाठियों से पीटने और आंसू गैस से गला घोंटने का प्रयोग कर रहे हैं। ऊपर से अंधभक्तों की एक फौज खड़ी कर दी है, जो इस जुल्म को देखकर तालियां बजाते हैं और कहते हैं- ‘वाह मोदी वाह!’
यह वह बदलाव है, जो २०१४ के बाद में हुआ है। नए भारत में अब एक ऐसी सरकार है, जो छात्रों को लाठियों से पीटने में आनंदित होती है। सरकार भूल गई है कि जब हम छात्र-छात्राओ को पीटते हैं तो हम अपने देश के भविष्य को पीट रहे होते हैं। सभी को नए भारत का गण (गन) तंत्र मुबारक…!
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं तथा व्यंग्यात्मक लेखन में महारत रखते हैं।)
