हरिगोविंद विश्वकर्मा
देश के बेशर्म लंबे समय से उपेक्षित महसूस कर रहे थे। उनका कहना था कि जब हर वर्ग के अधिकारों की रक्षा के लिए आयोग बन सकता है तो बेशर्मों को आखिर कब तक असंगठित छोड़ दिया जाएगा? इस समाज में नित नए बेशर्म जुड़ रहे थे, लेकिन सभी बेशर्म बिखरे हुए थे। राजधानी दिल्ली में रहनेवाले बेशर्म लाइम-लाइट में रहते थे। लेकिन दूर-दराज में रहनवाले बेशर्म गुमनामी का जीवन जीते थे। बेशक बेशर्मी की वजह से समाज में उन्होंने अच्छा नाम कमा लिया। लोकप्रिय हो गए। लेकिन उन्हें उतना एक्पोजर नहीं मिल पाता। लोकप्रियता का सारा आइसक्रीम दिल्ली के बेशर्म खा जाते थे।
इसके अलावा बेशर्म लोगों का आपस में एक-दूसरे से संपर्क नहीं था। सब अपने-अपने स्तर पर बेशर्मी की नुमाइश करके नाम या धन कमाते थे। अगर सारे बेशर्म एक मंच पर आ जाएं या उनका कोई संगठन बन जाए तो सारे बेशर्म एक मंच पर आएंगे। इससे कम बेशर्म लोग जान सकेंगे कि उनसे गलती कहां हुई, जो अपने सीनियर जितना बेशर्म नहीं बन सके। ऐसे लोग अपने सीनियर की संगति में सीजन्ड बेशर्म हो सकते हैं।
दरअसल, सीजन्ड बेशर्म वह बेशर्म है। जो एक झटके से अपनी इज्जत और मान-सम्मान को शरबत में डालकर पी जाता है। डकार लेने के बाद वह अलग ही महसूस करता है। उसके बाद वह इतना बेशर्म हो जाता है, इतना अधिक बेशर्म हो जाता है कि उसे किसी की किसी बात से रत्तीभर फर्क ही नहीं पड़ता। दुनिया कुछ भी कहती रहे। बेशर्म अपनी दुनिया में मस्त रहता है। बल्कि वह समय-समय पर आत्ममूल्यांकन भी करता रहता है कि कहीं उसके भीतर शर्म का कोई अंश तो शेष नहीं रह गया। कहीं उसकी बेशर्मी में कोई कसर तो बाकी नहीं रह गई। ऐसे बेशर्म अपने समाज के शिरोमणि होते हैं।
बेशर्मों के बीच संपर्क बढ़ाने के लिए एक अखिल भारतीय बेशर्म महासम्मेलन बुलाने का निर्णय लिया गया। बेशर्म महासम्मेलन का स्थल चुनने की बात चली तो राजधानी दिल्ली सबकी पसंद थी। दरअसल, सबसे ज्यादा बेशर्म राष्ट्रीय राजधानी में थे, तो अखिल भारतीय बेशर्म महासम्मेलन की मेजबानी का पहला हक दिल्ली का ही था। नियत समय पर एक स्टेडियम में अखिल भारतीय बेशर्म महासम्मेलन हुआ। सम्मेलन में ‘वर्ष का सर्वश्रेष्ठ बेशर्म’, ‘आजीवन निर्लज्जता सम्मान’ और ‘सार्वजनिक बेइज्जती के बावजूद मुस्कुराते रहने’ के पुरस्कार भी दिए गए।
बेशर्म समाज के एक बहुत बड़े बेशर्म जिन्होंने हाल ही में पूरी दुनिया में बेशर्मी के मामले में नाम कमाया था बोले, – दोस्तों जैसा कि आपको पता है। भारत बेशर्म लोगों के लिए उर्वर भूमि है। भारत में भी दिल्ली सबसे अच्छी जगह है। यहां बेशर्मी पर सबसे ज्यादा रिटर्न मिलता है। यही वजह है कि राजधानी में बेशर्मी के ढेर सारे लाभ हैं। जो राजधानी में साबित कर देता है कि वह सबसे बड़ा बेशर्म है, उसे लोग सिर आंखों पर बिठा लेते हैं। वह मौज करता है। राजधानी में कमोबेश हर बेशर्म की कम से कम सामाजिक और आर्थिक स्थिति अच्छी है। इसलिए मैं तो कहूंगा कि देशभर के बेशर्म लोगों का एक संगठन होना चाहिए। बेशर्म लोगों के अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए।
वक्ता का विचार सबको पसंद आया। खासकर बेशर्म लोगों के अधिकारों की रक्षा करनेवाले हिस्से के तो सभी मुरीद हो गए। लिहाजा, राष्ट्रीय बेशर्माधिकार आयोग के गठन का निर्णय लिया गया। सरकार से आग्रह किया गया कि बेशर्म लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए राष्ट्रीय बेशर्माधिकार आयोग का गठन समय की मांग है। एक ज्ञापन सरकार को दिया गया। ज्ञापन स्वीकार करनेवाला खुद उच्च स्तर का बेशर्म था। उसके अधिकारों का कई बार हनन हो चुका था। इससे उसे राष्ट्रीय बेशर्माधिकार आयोग के गठन का आइडिया बहुत पसंद आया। उसने इस बारे में अपने सहयोगियों से बातचीत की। वह जिससे बातचीत करता वही बेशर्म निकलता। पता चला कि सरकार में बेशर्म लोगों का बहुमत है और जब बात पैâली तो पता चला कि सरकार में ऊपर से नीचे तक सभी बेशर्म ही हैं इसीलिए सरकार इतनी तत्परता से काम कर पाती थी।
लिहाजा, सरकार ने एक इमरजेंसी बैठक बुलाई और राष्ट्रीय बेशर्माधिकार आयोग के गठन का निर्णय लिया। इसके लिए सरकार ने अधिसूचना जारी की। राष्ट्रीय बेशर्माधिकार आयोग बनने के तुरंत बाद एक न्यायाधीश सेवानिवृत्त हुए थे। उन्होंने भी अपने पैâसलों और कमेंट के लिए बेशर्मी के क्षेत्र में अच्छा नाम कमाया था। लिहाजा, उन्हें राष्ट्रीय बेशर्माधिकार आयोग का चेयरपर्सन बना दिया गया।
चेयरपर्सन बनते ही उन्होंने पहला आदेश जारी किया कि भविष्य में किसी भी बेशर्म को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा नहीं किया जाएगा। अगर कोई नागरिक किसी बेशर्म की बेइज्जती करने का प्रयास करेगा, तो उसे ‘भावनात्मक उत्पीड़न’ माना जाएगा। आदेश जारी होते ही देशभर के बेशर्मों में खुशी की लहर दौड़ गई। वे सड़कों पर उतर आए और नारा लगाने लगे- ‘शर्म करनेवाले होश में आओ, बेशर्मों को उनका अधिकार दिलाओ!’
