गुमनाम स्ट्रीट आर्टिस्ट ने कहा, ‘कला जब लोगों की आवाज बन जाए, तभी उसका असली मकसद पूरा होता है’
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
मुंबई की दीवारों पर व्यवस्था, पूंजीवाद और राजनीतिक पाखंड को चुनौती देने वाले गुमनाम स्ट्रीट आर्टिस्ट ‘टायलर’ का बनाया एक स्टेंसिल अब दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन की पहचान बन गया है। प्रदर्शनकारी इसे पोस्टरों, बैनरों और सोशल मीडिया पोस्ट में इस्तेमाल कर रहे हैं। इस तरह मुंबई की एक दीवार पर जन्मी कलाकृति राजधानी में युवाओं के गुस्से और प्रतिरोध की भाषा बन गई है।
टायलर को अक्सर ‘मुंबई का बैंक्सी’ कहा जाता है। उनकी असली पहचान सार्वजनिक नहीं है। वे वर्षों से स्टेंसिल और स्प्रे पेंट के जरिए भ्रष्टाचार, असमानता, सांप्रदायिकता, सरकारी निगरानी और सत्ता के दमन पर तीखी टिप्पणियां करते रहे हैं। उनका कहना है कि स्ट्रीट आर्ट किसी गैलरी तक सीमित सजावटी वस्तु नहीं, बल्कि आम आदमी तक सीधे पहुंचने वाला संवाद है।
कॉमिक किरदारों के माध्यम से सवाल
जंतर-मंतर पर कथित परीक्षा गड़बड़ियों और पेपर लीक के खिलाफ जुटे छात्रों ने कला को आंदोलन का महत्वपूर्ण हथियार बना लिया है। प्रदर्शन स्थल पर हाथ से बने पोस्टर, कार्टून, राजनीतिक व्यंग्य और लोकप्रिय फिल्मी तथा कॉमिक किरदारों के माध्यम से सरकार और शिक्षा व्यवस्था से सवाल पूछे जा रहे हैं। पूरा इलाका धीरे-धीरे एक खुली विरोध-प्रदर्शनी में बदल गया है।
चित्रों के जरिए भी सत्ता से जवाब मांग रहे हैं युवा
टायलर की कलाकृति
बनी आंदोलन का प्रतीक
टायलर ने अपनी कलाकृति के आंदोलन का प्रतीक बनने पर कहा कि जब कोई चित्र कलाकार से निकलकर जनता की सामूहिक आवाज बन जाता है, तब उसका अर्थ और प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। उनके लिए यह केवल व्यक्तिगत पहचान या प्रसिद्धि का प्रश्न नहीं, बल्कि उस मुद्दे का सवाल है जिसे कला सामने ला रही है। जंतर-मंतर का छात्र आंदोलन यह भी दिखा रहा है कि आज की युवा पीढ़ी केवल नारों से नहीं, बल्कि व्यंग्य, मीम, संगीत और चित्रों के जरिए भी सत्ता से जवाब मांग रही है। पुलिस कार्रवाई के बाद भी प्रदर्शनकारियों के दोबारा लौटने और आंदोलन जारी रखने से विरोध की धार और तेज हुई है। टायलर का स्टेंसिल अब महज एक तस्वीर नहीं रहा। वह उस पीढ़ी का प्रतीक बन चुका है, जो कह रही है कि परीक्षा का पर्चा ही नहीं, देश के युवाओं का भरोसा भी बार-बार लीक हो रहा है।
