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सोमैया विद्याविहार विश्वविद्यालय में ‘समकालीन साहित्य : नए संदर्भ’ राष्ट्रीय बहुभाषी संगोष्ठी उत्साहपूर्वक संपन्न

सामना संवाददाता / मुंबई

सोमैया विद्याविहार विश्वविद्यालय के के. जे. सोमैया स्कूल ऑफ लैंग्वेजेस एंड लिटरेचर की ओर से 24 एवं 25 जुलाई 2026 को ‘समकालीन साहित्य : नए संदर्भ’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय बहुभाषी संगोष्ठी का प्रथम दिवस तथा लेखक–अनुवादक संवाद कार्यक्रम अत्यंत उत्साहपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ। देशभर के प्रतिष्ठित साहित्यकारों, अनुवादकों, समीक्षकों, कवियों और शोधकर्ताओं की उपस्थिति से संगोष्ठी को राष्ट्रीय स्वरूप प्राप्त हुआ।
उद्घाटन सत्र में प्रख्यात लेखिका डॉ. सूर्यबाला मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थीं। उद्घाटन अवसर पर अपने संबोधन में उन्होंने साहित्य-सृजन, समीक्षा और अनुवाद के संदर्भ में महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा, “नवोदित लेखकों को मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है, किंतु उन्हें अपनी रचनाओं पर होने वाली रचनात्मक आलोचना को स्वीकार करने की मानसिक तैयारी भी रखनी चाहिए। केवल प्रशंसा की अपेक्षा न रखते हुए आलोचना से स्वयं को समृद्ध करने की प्रवृत्ति विकसित करनी चाहिए।” उन्होंने आगे कहा कि अनुवाद दो भाषाओं, समाजों और संस्कृतियों को जोड़ने वाला प्रभावी सेतु है। साहित्य-सृजन में यथार्थ और विवेक का समन्वय आवश्यक है। आज के वैश्विक संघर्षों की पृष्ठभूमि में मानवता के विनाश को रोकने के लिए लेखकों को अपनी रचनाओं के माध्यम से विवेक, संवेदना और शांति के विचारों का प्रसार करना चाहिए।
सोमैया विद्याविहार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डॉ. अजय कपूर की विशेष उपस्थिति में कार्यक्रम का उद्घाटन हुआ। विभिन्न सत्रों में समकालीन कहानी, उपन्यास, कविता, अनुवाद तथा प्रकाशन संस्कृति जैसे विषयों पर गंभीर चर्चा हुई।
इस अवसर पर डॉ. बालासाहेब लबडे के उपन्यास ‘चिंबोरे युद्ध’ का लोकार्पण वरिष्ठ साहित्यकार, समीक्षक एवं प्रकाशक डॉ. कुसुम लता सिंह (नई दिल्ली) एवं आमची मुंबई फेम लेखक व पत्रकार राजेश विक्रांत के करकमलों से संपन्न हुआ। इस अवसर पर कुसुमलता सिंह ने कहा कि हिंदी में व्यंग्यात्मक उपन्यास अपेक्षाकृत कम हैं और ‘चिंबोरे युद्ध’ अपनी विशिष्ट शैली, कथ्य और समकालीन दृष्टि के कारण इस परंपरा को समृद्ध करने वाली महत्वपूर्ण कृति है।
संगोष्ठी में विभिन्न अनूदित पुस्तकों पर विशेष परिसंवाद आयोजित किया गया। इसमें डॉ. बाळासाहेब लबडे की ‘चिंबोरे युद्ध’ तथा ‘मुंबई… बंबई… बॉम्बे’, देवा झिंजाड की ‘एक रोटी तीन चूल्हे’, डॉ. हेमेंद्र चंडालिया द्वारा अनूदित ‘व्हीलचेयर पर लोकतंत्र’, तथा ‘माधव कौशिक की चयनित कविताएँ’ के अनूदित संस्करणों पर विद्वानों ने समीक्षात्मक चर्चा की।
‘मुंबई… बंबई… बॉम्बे’ के हिंदी अनुवाद के संदर्भ में अनुवादक भारत वेडे ने अनुवाद प्रक्रिया के अपने अनुभव साझा किए। इसी अवसर पर प्रा. प्रतिभा सराफ के कहानी-संग्रह के हिंदी अनुवाद, जिसे डॉ. गोरख थोरात ने किया है, का लोकार्पण वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सूर्यबाला के करकमलों से हुआ। उन्होंने इस कहानी-संग्रह की नवीनता और रचनात्मक विशेषताओं पर प्रकाश डाला।
लेखक डॉ. बाळासाहेब लबडे ने समकालीन साहित्य, सामाजिक यथार्थ तथा अनुवाद के माध्यम से साहित्य को व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुँचाने की प्रक्रिया पर अपने विचार व्यक्त किए।
‘अनुवाद और प्रकाशन संस्कृति’ विषयक विशेष सत्र में प्रख्यात अनुवादक डॉ. गोरख थोरात ने समकालीन साहित्य के अनुवाद की चुनौतियों, संभावनाओं तथा बदलती प्रकाशन संस्कृति पर विस्तृत मार्गदर्शन किया। इस सत्र में मनोज पाठक (वर्णमुद्रा प्रकाशन) भी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में डॉ. कुसुमलता सिंह, डॉ. बळीराम गायकवाड, नरेंद्र पुंडरीक, इंडिया इनसाइड के संपादक अरुण सिंह, प्रा. प्रतिभा सराफ, डॉ. हेमेंद्र चंडालिया, भारत वेडे, देवा झिंगाड तथा राजेश विक्रांत व परदे के पीछे के संपादक राजीव रोहित सहित अनेक साहित्यकारों ने सहभागिता की।
25 जुलाई को विभिन्न शोधपत्रों का प्रस्तुतीकरण, साहित्यिक संवाद और मुक्त चर्चा के कारण संगोष्ठी अत्यंत अध्ययनपरक रही। समापन सत्र वरिष्ठ कवि नरेंद्र पुंडरीक की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। उन्होंने अनुवाद, साहित्य और समाज के परस्पर संबंधों पर विचार व्यक्त करते हुए इस प्रकार के आयोजन को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने डॉ. बालासाहेब लबडे के हिंदी कविता-संग्रह ‘मुंबई… बंबई… बॉम्बे’ को शहर की ऐतिहासिक चेतना और बदलते शहरी अनुभवों को अभिव्यक्त करने वाला विशिष्ट काव्य-संग्रह बताया।
समापन अवसर पर आयोजकों ने सभी साहित्यकारों, शोधकर्ताओं, अनुवादकों, विद्यार्थियों तथा उपस्थित अतिथियों का आभार व्यक्त किया। समकालीन भारतीय साहित्य, अनुवाद और बहुभाषी संवाद को नई दिशा देने वाला यह उपक्रम सफलतापूर्वक संपन्न होने की भावना व्यक्त की गई।

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