पवन चंचल, लहरें चंचल
होती यह चितवन चंचल
किंतु सबसे चंचल यह मानव मन।
मतवाली पवन कभी कहीं तो ठहरती
लहरें टकरा तटों से
मिटाती अपना अस्तित्व ।
दृष्टि घूमें गगन से धरा, दायें कभी बाएं
नयनों की अपनी सीमाएं।
चंचल मन की बात न पूछो
कुलांचे भरता रहता पल पल
होता अशांत, रहता उतावला
क्षण में घूम आता पूरा धरातल
निश्चल ना रह पाता पल भर
उथल पुथल भरा यह मन।
पल में तोला पल में माशा
नित उभरती एक स्वप्निल आशा
कभी सागर में तिरता
पंखहीन है फिर भी आकाश में उड़ता
कितना भी रोको कभी ना रुकता
जितना बांधों उतना फिसलता
यही है मन का चंचल पन।
साधारण जन तो क्या
मन चंचल ऋषि,मुनियों का होता
रत तपस्या में विश्वामित्र हुए अशांत
झंकार मेनका की पायल सुन।
मन की चंचलता में इंद्र देव भटके
तिलोत्तमा की देह सोष्ठव में अटके
देख, गहन तपस्या ऋषि गौतम की
मन इंद्रदेव का हो गया आशंकित
शील हरण प्रयास किया मां अहिल्या का
श्राप वश पाया पुनः बालपन।
स्वर्ण मृग देखकर, जगजननी
मां सिया हुआ मन चंचल
प्रभू राम गये पकड़ने
मां सीता का हुआ हरण।
स्वरूप नखा थी अनुजा रावण
करती किसी राक्षस का वरण
मन भा गये लक्ष्मण
कारण बना लंका का दहन।
मन धृतराष्ट्र का भी मचला था
भेंट चढ़ गये पांडव ,कौरव वंश।
कृष्ण दूत उद्धव को सुन सके
थे उतावले देखने अपने कान्हा को
सभी वृंदावन वासियों के मन।
कभी गृहस्थी से
बनते योगी, संयासी
कभी मानवता के दुश्मन
हर अवस्था में भारी पड़ता
नटखट,चपल चंचल मन।
-बेला विरदी
