बांवरा चांद!

लगता है आज बांवरा चांद
कुछ अधिक बहक गया है,
काले मेघों का घूंघट ओढ़
कुछ नटखट-सा हो गया है।
बंजारा तो तू पहले से ही है,
अब हमसे आंख-मिचौनी खेल रहा है।
अधिक चतुराई न कर चंदा,
पाने झलक तेरे रूप सलोने की,
कुमुद तलैया का मन बेचैन हो गया है।
तेरी शीतल, खिली चांदनी
कुसुमित रातरानी से महकी बगिया में,
चकोर कुछ अधिक बहक गया है।
कोमल शीतलता के स्पर्श से
विलग प्रेमियों का मन
और दहक रहा है।
विरह से सताई अभिसारिका
अपने पुर से ज्यों निकली,
उसकी पायलिया का घुंघरू
बोल उठा है।
तू जा छुपा अब काले मेघों में,
अपनी चांदनी को ही ग्रहण लगा रहा।
देख, जुगनुओं ने ज्योति से जगमग
एक चंदोवा तान दिया है।
शांति और प्रेम का प्रतीक तू है,
फिर हमसे छलावा क्यों करता है?
तेरे घटते-बढ़ते आकार को निहारते
हमने अपना जीवन जी लिया है।
-बेला विरदी

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