मुख्यपृष्ठस्तंभहनीफनामा: स्वर सम्राट रफी को श्रद्धांजलि!

हनीफनामा: स्वर सम्राट रफी को श्रद्धांजलि!

हनीफ जवेरी

कुछ आवाजें सिर्फ सुनी नही जातीं, वे दिल की धड़कनों में बस जाती हैं। मोहम्मद रफी की आवाज, एक ऐसी आवाज, जिसने मोहब्बत को एहसास दिया, दर्द को जुबान दी और तन्हाई को हमसफर बना दिया। आज बरसों बाद भी जब रफी का कोई गीत कानों में पड़ता है, तो लगता है जैसे बीता हुआ जमाना फिर से सांस लेने लगा हो। किसी को अपना गुजरा हुआ प्यार याद आता है, तो किसी की आंखें नम हो जाती हैं। रफी सिर्फ गायक नहीं थे। वे करोड़ों लोगों की भावनाओं की आवाज थे। एक ऐसी आवाज, जो खामोश हो जाने के बाद भी कभी खामोश नहीं हुई।
दो रोज पहले ही गायक मोहम्मद रफी की ४६वीं पुण्यतिथि थी। ३१ जुलाई १९८० का वह मनहूस दिन आज भी हमें याद है। उस रोज रफी ने हमेशा की तरह रमजान का रोजा रखा था। सब कुछ ठीक चल रहा था कि शाम को उनके सीने में हल्का-सा दर्द उठा। पहले इसे एसिडिटी समझा गया, लेकिन जब दर्द बढ़ने लगा तो उन्हें तुरंत बांद्रा के नेशनल हॉस्पिटल ले जाया गया। उन दिनों मुश्किल यह हुई कि अस्पताल में हृदय रोगियों के लिए जरूरी उपकरण उपलब्ध नहीं थे। लिहाजा तुरंत रफी को नेशनल हॉस्पिटल से बॉम्बे हॉस्पिटल ले जाने का पैâसला किया गया। रात ९:४५ बजे उन्हें बॉम्बे हॉस्पिटल में भर्ती किया गया, लेकिन रात १०:२५ बजे रफी ने आखिरी सांस ली और इस दुनिया को अलविदा कह दिया। रफी के निधन की खबर आग की तरह पैâल गई। हर कोई यह खबर सुनकर हैरान था, लेकिन सबसे ज्यादा हैरान फिल्म निर्माता-निर्देशक जे.ओमप्रकाश थे, जिन्होंने एक दिन पहले, यानी २९ जुलाई १९८० को ही रफी से अपनी फिल्म आस-पास के लिए एक गीत रिकॉर्ड करवाया था। उस गीत को आनंद बख्शी ने लिखा था और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने संगीतबद्ध किया था।
ओमप्रकाश ने मुझसे एक मुलाकात के दौरान रफी और उनकी उस आखिरी रिकॉर्डिंग को लेकर जो बताया, उससे मुझे यह आभास हुआ कि शायद रफी को कहीं न कहीं एहसास था कि अब वह नहीं रहेंगे।
फिल्म आस पास का गीत रिकॉर्ड हो चुका था और रफी सबसे मिलकर रिकॉर्डिंग रूम से बाहर भी आ चुके थे। जैसे ही उन्होंने सीढ़ियों पर पहला कदम रखा, पीछे से ओमप्रकाश ने उन्हें आवाज देकर रोका और बताया कि गीत की चार पंक्तियां अभी रिकॉर्ड होना बाकी हैं,जो छूट गई थीं। उन्होंने यह भी कहा, ‘कोई बात नहीं, इन्हें हम कल रिकॉर्ड कर लेंगे।’ यह सुनते ही रफी तुरंत वापस मुड़े और इस बात पर जोर दिया कि आज ही उन चार पंक्तियों की रिकॉर्डिंग पूरी कर ली जाए। जो पंक्तियां रिकॉर्ड की गईं, वह इस तरह थीं –
`तेरे आने की आस है दोस्त,
शाम फिर क्यों उदास है दोस्त।
महकी-महकी फिजा ये कहती है,
तू कहीं आस-पास है
रफी ने स्टूडियो से निकलते वक्त कहा…`मैं चलूं?’
जबकि वह हमेशा जाते समय कहा करते थे, ‘अच्छा, मैं जा रहा हूं।’
रफी के ये तीन शब्द भी कहीं न कहीं यह एहसास दिलाते हैं, मानो वह इस दुनिया से जाने की इजाजत ले रहे हों।
पद्मश्री मोहम्मद रफी तो चल दिए, लेकिन उस रोज आसमान भी रो पड़ा। इतनी मूसलाधार बारिश हुई, फिर भी हजारों लोग उनके जनाजे के साथ कब्रिस्तान तक चलते रहे। दो बार तो उनकी जनाजे की नमाज अदा की गई। २४ दिसंबर १९२४ को कोटला (पंजाब) में जन्मे रफी पहले ऐसे भारतीय थे, जिन्हें सऊदी हुकूमत ने मक्का की मस्जिद में अजान देने की इजाजत दी थी, जो किसी सम्मान से कम नहीं। रफी को इस दुनिया से अलविदा कहे बरसों बीत गए, लेकिन आज भी उन्हें भुला पाना मुश्किल है। उन्होंने ठीक ही कहा था-
‘तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे,
जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे’

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