सामना संवाददाता / वाराणसी
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के भोजपुरी अध्ययन केंद्र के शोध संवाद समूह द्वारा महान साहित्यकार एवं लोकप्रिय फिल्म गीतकार मोती बीए की 107वीं जयंती के अवसर पर राहुल सभागार में ‘स्मृति-संगोष्ठी’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के संयोजक एवं भोजपुरी अध्ययन केंद्र के समन्वयक प्रो. प्रभाकर सिंह के मार्गदर्शन में आयोजित इस संगोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार श्रीप्रकाश शुक्ल ने की।
कार्यक्रम के प्रथम वक्ता सुप्रसिद्ध कवि व फिल्म गीतकार मनोज भावुक ने मोती बीए के फिल्मी सफर पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि हिन्दी सिनेमा में भोजपुरी को प्रतिष्ठा दिलाने का सबसे बड़ा श्रेय मोती बीए को जाता है। उन्होंने बताया कि बीएचयू से बीए करने के बाद ‘बीए’ उनके नाम का स्थायी तखल्लुस बन गया। वर्ष 1948 में प्रदर्शित फिल्म नदिया के पार के सभी भोजपुरी गीतों ने पूरे देश में भोजपुरी की नई पहचान बनाई। भावुक ने कहा कि मोती बीए ने लगभग 80 फिल्मों के लिए गीत लिखे और बाद में भोजपुरी फिल्मों को भी अपनी सशक्त लेखनी से समृद्ध किया। उन्होंने उनके क्रांतिकारी लेखन, बहुभाषी साहित्य-सृजन तथा लगभग 40 पुस्तकों का उल्लेख करते हुए उन्हें भाषा, साहित्य और संस्कृति का अनमोल ‘मोती’ बताया।
द्वितीय वक्ता विवेक निराला ने मोती बीए के साहित्यिक अवदान पर प्रकाश डालते हुए उनकी हिन्दी, भोजपुरी, उर्दू और अंग्रेज़ी में रचित कृतियों, भोजपुरी सानेट, सेमर के फूल, तुलसी रसायन तथा मेघदूत के भोजपुरी काव्यानुवाद जैसी कालजयी रचनाओं का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मोती बीए का साहित्य लोकजीवन, संवेदना और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत दस्तावेज़ है।
साहित्यकार सूर्यनारायण जी ने मोती बीए से जुड़े अपने आत्मीय संस्मरण साझा करते हुए उनके सरल व्यक्तित्व, मानवीय संवेदनाओं और साहित्य के प्रति समर्पण को याद किया। उन्होंने कहा कि मोती बीए जैसा व्यक्तित्व नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में श्रीप्रकाश शुक्ल ने मोती बीए के हिन्दी और भोजपुरी साहित्य का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए कहा कि यद्यपि उन्होंने अनेक भाषाओं में उत्कृष्ट सृजन किया, किन्तु उनकी आत्मा भोजपुरी में बसती थी। उन्होंने कहा कि मोती बीए ने भोजपुरी को साहित्यिक गरिमा और राष्ट्रीय पहचान दिलाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
कार्यक्रम के अंत में संयोजक एवं भोजपुरी अध्ययन केंद्र के समन्वयक प्रो. प्रभाकर सिंह ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि मोती बीए जैसे मनीषियों की स्मृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाना भोजपुरी अध्ययन केन्द्र का दायित्व है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन भोजपुरी भाषा, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण तथा उसके अकादमिक विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संचालन शिखा सिंह ने किया । इस अवसर पर प्रो. आशीष त्रिपाठी, प्रो. नीरज खरे, प्रो. देवेंद्र, विंध्याचल यादव, हरीश कुमार, अनीता सिंह और बहुत से शोधार्थी विद्यार्थी उपस्थित रहे।साहित्यप्रेमियों एवं शोधछात्रों ने मोती बीए को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
