प्रणव प्रियदर्शी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जेन-जी से दोस्ती गांठने का जैसे प्रण ले चुके हैं। नए-नए विडियो और रीलों के जरिए वह उससे संवाद कायम करने का प्रयास लगातार कर रहे हैं। हालांकि, जेन-जी ने अभी तक उनकी इन कोशिशों पर कोई पॉजिटिव रिस्पॉन्स नहीं दिया है। फिर भी, मोदी निराश नहीं हुए हैं। वह अपनी तरफ से उसे उन तमाम गंदी गालियों के लिए माफी का एलान भी कर चुके हैं, जो कथित तौर पर उसने प्रदर्शनों के दौरान उनके लिए निकाली थीं।
मुंह में आवाज नहीं
मगर जो लाठियां जेन-जी के प्रदर्शनकारी लड़के-लड़कियों पर पड़ीं और जो गालियां उन्हें सोशल मीडिया पर मोदी समर्थकों की ओर से लगातार पड़ रही हैं, उसके लिए जेन-जी से माफी मांगने कोई अभी तक आगे नहीं आया है। गृह मंत्री अमित शाह ने अपने होंठ कुछ इस तरह से सिल रखे हैं कि उनके मुंह से कोई आवाज नहीं निकल रही। प्रधानमंत्री मोदी को अपने लिए निकाली गई गालियों के अलावा कुछ और दिखाई या सुनाई ही नहीं दे रहा।
पुराने तरीकों पर भरोसा
साफ है कि पीएम मोदी और उनके तमाम रणनीतिकार अब भी पुराने तौर-तरीकों पर ही भरोसा करके चल रहे हैं। उन्हें लगता है कि ‘थोड़ी सख्ती, थोड़ा दुलार और थोड़ी नफरत, थोड़ा झूठ का व्यापार’ वाला फॉर्मूला हमेशा की तरह इस बार भी काम बना देगा। इसी फॉर्मूले के तहत जहां मोदी इंस्टा के नए-नए रील जारी कर जेन-जी को पटाने में लगे हैं, वहीं अमित शाह का पुलिसिया तंत्र तमाम आश्वासनों के बावजूद परदे के पीछे आंदोलन के समर्थक तत्वों को डराने-धमकाने का काम कर उनकी हिम्मत पस्त करने के अभियान में लगा हुआ है।
निशाने पर लड़कियां
इस अभियान में हालांकि, गिरफ्तारी जैसे आधिकारिक कदमों से बचा जा रहा है, लेकिन सोशल मीडिया पर आ रहे वीडियो इस आरोप को मजबूती देते हैं कि पुलिस और सत्तारूढ़ दल से जुड़े संगठनों के लोग इन युवाओं, बच्चों के घर वालों पर दबाव बनाने का प्रयास लगातार कर रहे हैं। अल्पसंख्यक और महिलाएं विशेष रूप से निशाने पर हैं। खुद प्रधानमंत्री ने सबसे ज्यादा हैरत इस बात पर जताई कि लड़कियां वैâसे उस तरह की गंदी गालियां अपने मुंह से निकाल सकती हैं।
दुष्प्रचारों से अछूती
मगर यही चालें सरकार के लिए मुसीबत का अगला चरण शुरू होने का कारण बन सकती हैं। बीजेपी नेतृत्व इस बात को ठीक से नहीं समझ पा रहा कि उसने अपनी राजनीति को मजबूती देने के लिए जितने भी उपाय किए थे, जिस तरह के भी टूल गढ़े थे, वे सब जेन-जी के आगे नाकाम साबित हो चुके हैं। यह पीढ़ी टीवी देखती नहीं। सो, कथित मेनस्ट्रीम मीडिया के जरिए पिछले १२ वर्षों से चल रहे दुष्प्रचारों से करीब-करीब अछूती है। सोशल मीडिया पर है, लेकिन व्हॉट्सऐप के फैमिली ग्रुप पर चल रहे मैसेजों को देखने का वक्त इसके पास नहीं है।
जवाबदेही की अपेक्षा
बीजेपी की सांप्रदायिक और उग्र राष्ट्रवादी राजनीति द्वारा गढ़े गए दुश्मन उसके माता-पिता को भले डराते रहे हों, उसे प्रभावित नहीं करते। अब्दुल को टाइट करनेवाला दुष्प्रचार उसे खुश नहीं करता। लड़कियों (या लड़कों) के संस्कार बिगड़ने का डर उसके पैâसलों से उसे नहीं डिगाता। उसे मालूम है कि वह एक लोकतांत्रिक देश का नागरिक है और अपनी सरकार से जवाबदेही, पारदर्शिता और न्याय की अपेक्षा रखना उसका अधिकार है, जिससे कोई भी सरकार उसे वंचित नहीं कर सकती।
सरकार की हदें
उसके हालिया प्रदर्शन पर पुलिसिया दमन ने उसे इस सरकार की सीमाओं से भी अवगत करा दिया है। उसे पता है कि यह सरकार पहले डराती है और फिर डर कर पीछे हट जाती है। वह जाति, धर्म, भाषा आदि के आधार पर फायदों का झूठा आश्वासन तो दे सकती है, लेकिन सबके लिए न्यायपूर्ण व्यवहार सुनिश्चित नहीं कर सकती। सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि यह पीढ़ी ठीक वही चीज लेने की जिद ठान बैठी है जो इस सरकार के पास है ही नहीं।
एक ही रास्ता
ऐसे में रास्ता एक ही है कि सरकार के हिस्से में जो तात्कालिक शांति आई है, उसे जहां तक हो सके बनाए रखने की कोशिश करे। जेन-जी के बच्चे घर लौट चुके हैं तो उन्हें वापस सड़क पर लौटने को न उकसाए। चाहे जिस किसी भी कारण से हो, अगर उनकी सड़क पर वापसी हुई तो इस बार मामला सांकेतिक नहीं रह जाएगा। सरकार के पास धर्मेंद्र प्रधान जैसे किसी मंत्री का इस्तीफा देकर काम चलाने का विकल्प नहीं होगा। गृहमंत्री अमित शाह का इस्तीफा आंदोलन की स्वाभाविक मांग होगी और सरकार के लिए उस मांग को स्वीकार करने का मतलब होगा कि अपनी मौत का फरमान जारी करना।
यह कोई संयोग नहीं कि Aघ्एA जैसे छात्र संगठन और कांग्रेस नेतृत्व आंदोलन के इस दूसरे चरण के लिए कमर कसे दिखाई दे रहे हैं, लेकिन अभिजीत दीपके की पूरी मंडली सरकारी तंत्र के गुस्से का शिकार बने युवाओं को कानूनी सहायता मुहैया कराने के प्रयासों तक खुद को सीमित रखे हुए है। जब तक बात हद से ज्यादा न बढ़ जाए वह दोबारा उस झंझट में नहीं पड़ना चाहेगी, जिससे बमुश्किल उसका पिंड छूटा है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक मामलों के जानकार हैं)
