सुप्रीम कोर्ट से पुराने शुल्क रद्द होने के बाद नए रास्ते से टैरिफ लगाने का आरोप
वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीति के खिलाफ अमेरिका के भीतर ही बड़ा कानूनी मोर्चा खुल गया है। डेमोक्रेटिक नेतृत्व वाले २५ राज्यों ने ट्रंप प्रशासन के खिलाफ अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय व्यापार न्यायालय में मुकदमा दायर कर नए आयात शुल्कों को गैरकानूनी घोषित करने और उनकी वसूली पर रोक लगाने की मांग की है।
ट्रंप प्रशासन ने २४ जुलाई को ५९ देशों और यूरोपीय संघ से आने वाले सामान पर १० से १२.५ प्रतिशत तक टैरिफ लगाया था। सरकार का दावा है कि संबंधित देश अपनी आपूर्ति शृंखलाओं में जबरन श्रम से बने उत्पादों को रोकने के लिए पर्याप्त कार्रवाई नहीं कर रहे हैं। ये शुल्क अमेरिकी व्यापार कानून की धारा ३०१ के तहत लगाए गए हैं।
राज्यों का आरोप है कि जबरन श्रम का मुद्दा केवल बहाना है और वास्तविक उद्देश्य उन व्यापक आयात करों को नए कानूनी आवरण में दोबारा लागू करना है, जिन्हें अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने २० फरवरी २०२६ को रद्द कर दिया था। सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि अंतर्राष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्ति अधिनियम राष्ट्रपति को एकतरफा टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं देता।
न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल लेटिशिया जेम्स सहित मुकदमा दायर करने वाले राज्यों ने कहा है कि प्रशासन ने जरूरी जांच और कानूनी प्रक्रिया पूरी किए बिना लगभग पूरी दुनिया पर शुल्क थोप दिया। राज्यों ने अदालत से वसूले गए टैरिफ की रकम लौटाने का आदेश देने की भी मांग की है। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि नई कार्रवाई कानून सम्मत है और अमेरिकी बाजार को जबरन श्रम से बने उत्पादों से बचाने के लिए जरूरी है।
ट्रंप ने ईरान वार्ता में पाकिस्तान को किया किनारे!
ईरान के साथ संभावित वार्ता को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ताजा बयान ने पाकिस्तान की कूटनीतिक भूमिका पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ट्रंप ने तनाव कम कराने के प्रयासों का उल्लेख करते हुए सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे क्षेत्रीय देशों का नाम लिया, लेकिन पाकिस्तान का जिक्र नहीं किया। यह घटनाक्रम इसलिए भी अहम है क्योंकि कुछ महीने पहले तक ट्रंप पाकिस्तान को अमेरिका और ईरान के बीच संवाद स्थापित कराने वाला प्रमुख मध्यस्थ बताते रहे थे। अब ट्रंप के बयान में पाकिस्तान का नाम गायब होने से इस्लामाबाद की कूटनीतिक उपलब्धियों के दावों को झटका लगा है। खास बात यह है कि ईरान ने अमेरिकी वार्ता के दावे से ही इनकार करते हुए कहा है कि फिलहाल उसकी बातचीत केवल ओमान के साथ समुद्री मार्ग और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े मुद्दों पर हो रही है। इससे पूरी मध्यस्थता प्रक्रिया को लेकर भ्रम और गहरा गया है। पाकिस्तान और कतर अब भी पर्दे के पीछे संदेशों के आदान-प्रदान और तनाव घटाने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन ट्रंप की नई सूची में इस्लामाबाद की अनुपस्थिति को उसकी घटती अहमियत के रूप में देखा जा रहा है। फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि पाकिस्तान पूरी तरह बाहर हो चुका है, लेकिन कभी मध्यस्थता का श्रेय लेने वाले इस्लामाबाद के लिए यह निश्चित रूप से असहज संकेत है।
ईरान को ट्रंप की आखिरी चेतावनी ‘समझौते पर हस्ताक्षर करो, वरना मौका खत्म’
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान के साथ बातचीत जारी है और तेहरान के पास अमेरिका के साथ एक ‘अच्छे समझौते’ पर हस्ताक्षर करने का यह आखिरी मौका है। ट्रंप ने कहा कि वार्ता केवल हॉर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसका सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा ईरान का परमाणु निशस्त्रीकरण होना चाहिए।
ट्रंप ने कहा, ‘वे अभी बातचीत कर रहे हैं। उन्होंने केवल एक बयान जारी किया है, जिसमें इससे पूरी तरह इनकार नहीं किया गया। ईरान हमला नहीं चाहता था। उन्होंने कहा है कि वे स्ट्रेट के बारे में बात करना चाहते हैं, लेकिन मेरे नजरिए से इससे भी अधिक जरूरी ईरान के डीन्यूक्लियराइजेशन पर बातचीत है। यह उनके लिए एक अच्छे दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने का आखिरी मौका है।’ हालांकि ट्रंप के दावे और ईरान के आधिकारिक रुख में साफ विरोधाभास दिखाई दे रहा है। ईरानी विदेश मंत्रालय ने कहा है कि अमेरिका के साथ कोई प्रत्यक्ष वार्ता न तो चल रही है और न ही फिलहाल निर्धारित है। तेहरान के मुताबिक, ओमान के माध्यम से केवल समुद्री आवगमन और हॉर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े मुद्दों पर संपर्क किया जा रहा है।
