मुख्यपृष्ठस्तंभभोजपुरिया व्यंग्य: चलीं पकोड़ा खाईजा... चुनावी जीत पे जश्न मनाई जा

भोजपुरिया व्यंग्य: चलीं पकोड़ा खाईजा… चुनावी जीत पे जश्न मनाई जा

प्रभुनाथ शुक्ल / भदोही
बरखा के मौसम बड़ा बेईमान होला। कब बादर बरस जाई, कब बिजली चमक जाई आ कब राजनीति के तापमान चढ़ जाई, केहू ना जानेला। एह दिनन में त मौसम विभाग से जादे राजनीतिक विश्लेषक सही भविष्यवाणी करे के दावा करत बाड़ें।
बिहार के बांकीपुर आ मध्य प्रदेश के दतिया से जइसे चुनावी नतीजा आइल, ओहसे बरखा के मजा दुगुना हो गइल। चाय के दुकान पर अब पकोड़ा कम, राजनीति जादे तरे लागल बा। एक हाथ में चाय के कुल्हड़, दोसरा हाथ में मोबाइल, आ मुंह पर चुनावी गणित, ई दृश्य अब हर गली-मोहल्ला के पहचान बन गइल बा।
संसद भवन के बाहर के तस्वीर भी बदलल-बदलल लागत बा। जवन नेता काल्हे तक एक-दूसरा पर शब्द-बाण छोड़त रहलें, उहे आज संतई के चादर ओढ़ले मुस्कुरात नजर आवत बाड़ें। लागता बरखा के पानी राजनीति के ताप भी कुछ देर खातिर ठंडा कर देले बा। जनता सोचतिया, ई बदलाव मौसम के असर बा कि सचमुच मन बदल गइल?
चाय के गुमटी पर बैठल ‘विशेषज्ञ’ लोग के उत्साह देखे लायक बा। पांच मिनट में सरकार बना देला, सात मिनट में गिरा देला आ दस मिनट में अगिला चुनाव के पूरा नतीजा सुना देला। एह विश्वविद्यालय में ना डिग्री के जरूरत बा, ना अनुभव के बस गरम चाय, दू गो पकोड़ा आ थोड़ा राजनीतिक जोश काफी बा। बाकि लोकतंत्र के खूबसूरती भी एह में बा कि जनता हर चुनाव में नया संदेश देले। जीत पर जश्न मनावल ठीक बा, हार पर मंथन भी जरूरी बा। राजनीति में मौसम रोज बदल सकेला, एह से आज के मुस्कान काल्हे के चुनौती भी बन सकेले।
फिलहाल त बरखा बरस रहल बा, कड़ाही में पकोड़ा छन रहल बा, टीवी पर बहस चल रहल बा आ सोशल मीडिया पर ज्ञान के बाढ़ आ गइल बा। मौसम के आनंद लीं, बहस करीं, मुस्कुराईं, बाकि याद रखीं, लोकतंत्र के सबसे मजबूत छाता आखिरकार जनता के हाथे में रहेला। अगली कलम में फिर मुलाकात होई, तब तक बरखा के मजा लीं। राजनीति त हर मौसम में गरम रहिए करेले।
!!समाप्त!!

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