सूफी खान
-इराक की रूह कंपाने वाली दास्तां
ईरान वर्सेस अमेरिका इजरायल और अरब मुल्कों का अलायंस। ४० दिनों की भीषण जंग और उसके बाद भी बने हुए तनाव के बीच ईरान के भरपूर प्रभाव वाले इराक में अरबईन का सफर जारी है। इस वक्त मिडिल ईस्ट में जो हालात हैं, उसके बीच खबरें आती रहीं कि कई अरब देशों ने तो अपने शहरियों को इमाम हुसैन के चहल्लुम यानी अरबईन के लिए इराक पहुंचने पर बैन ही कर दिया है। बावजूद इसके लाखों लोग इस वक्त इराक में है और अरबईन के मार्च का हिस्सा बने हैं। आज दुनियाभर में इमाम हुसैन का चहल्लुम यानी अरबईन मनाया जा रहा है। इराक में नजफ से लेकर कर्बला तक के इस सफर को करने लोग इस बार अपनी जान जोखिम में डालकर आए हैं। जान जोखिम में इसलिए क्योंकि इस बार का अरबईन पर खतरात बहुत हैं। एक तरफ तो सऊदी और अमेरिका मिलकर यमन से लेकर इराक तक ईरानी रजिस्टेंस पर मार रहे हैं। दूसरी तरफ अगर ईरान पर हमला होता है तो आग इराक तक जाएगी। लेकिन अरबईन बेखौफ जारी है।
तो करबला में इमाम हुसैन के श्राइन की पैदल जियारत यानी अरबईन वॉक आज दुनिया के सबसे बड़े इंसानी कारवां में गिनी जाती है। सोचिए मिडिल ईस्ट में इतने तनाव के बीच इमाम हुसैन के चाहने वाले नहीं रुके, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब इस सफर पर करीब करीब रोक लगा दी गई थी। साल १९७९ में सद्दाम हुसैन ने इराक की बागडोर अपने हाथ में ली थी। उसी ठीक उसी साल ईरान में इस्लामिक इंकलाब आ गया। इसके चलते सद्दाम हुसैन की सरकार को ये खदशा पैदा हो गया है कि इराक के अंदर इतनी बड़ी मजहबी गैदरिंग आगे चलकर कहीं उनकी सरकार के लिए चुनौती ना बन जाए। इसके चलते इमाम हुसैन के रौजे की जियारत के लिए अरबईन वॉक को सरकार की सख्त निगरानी में लाया गया। कुछ सालों के अंदर ही हालात ऐसे हो गए कि नजफ से करबला तक पैदल चलना मुश्किल बना दिया गया। सरकारी इजाजत के बिना उस वक्त इराक में बड़ी तादाद में लोगों का पैदल चलना जुर्म माना जाता था। १९८० से लेकर साल २००३ तक अरबईन वॉक पर एक तरह की पाबंदी ही रही। उस वक्त की इराक सरकार ने कर्बला जाने वाले तमाम रास्तों पर पहरा बैठा दिया था। इसके बाद भी इमाम हुसैन को चाहने वालों का जज्बा कम नहीं हुआ और छुपछुप कर रात के अंधेरे में खेतों और रेगिस्तानों के रास्ते कर्बला की तरफ पैदल चल पड़ते थे।
सबसे बड़ा हादसा १९७७ में पेश आया, जिसे अरबईन इंतेफादा कहा जाता है। उस वक्त सद्दाम हुसैन के हाथों में इराक की सत्ता तो नहीं थी, लेकिन उनकी पार्टी का खासा दबदबा था। सरकार उनकी बाथ पार्टी यानी (अरब सोशलिस्ट बाथ पार्टी) की थी और सद्दाम हुसैन का अपनी पार्टी पर पूरा कंट्रोल था। ये वो साल था जब हजारों लोगों ने इराक में नजफ से करबला तक पैदल जाने की कोशिश की। लेकिन इराकी सिक्योरिटी फोर्सेस ने रास्ता रोका तो फिर झड़पें होने लगी। बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुई। गिरफ्तार लोगों पर बगावत का आरोप लगा। अरबईन के करने के जुर्म में उस वक्त बहुत से लोगों पर अदालतों में मुकदमे चले और सजा सुनाई गई।
तो जो आज अरबईन चल रहा है वो उस वक्त के इराकियों की कुर्बानी और सहनशीलता और इमाम के लिए मोहब्बत का भी नतीजा है। कहते हैं कि इश्क इम्तेहान लेता है और इराक के लोगों ने वो कठिन इम्तेहान दिया था।
अरबईन के दौरान इराक में स्थानीय लोग मेहमानों के खाने पीने का जिम्मा उठाते हैं वो भी पूरी तरह प्रâी। सड़क को अगर दुनिया का सबसे लंबा दस्तरखान कहा जाए तो गलत नहीं होगा। ये नजारा इराक में हर साल देखने को मिलता है। अमूमन तीन दिनों में नजफ से करबला का सफर तय होता है। दस्तूर ये है कि सुबह की नमाज से चलना है और इशा की नमाज के बाद रास्ते में किसी भी कैंप पर जाकर आराम करते हैं। यहां ख्वातीन के पर्दे का खास इंतजाम होता है। दिन डूबते ही मकामी इराकी लोग अपने अपने वैंâप में जायरीन को आवाज देकर बुलाते हैं और बड़ी हिफाजत से ठहराते हैं।
करीब तीन दिन का सफर तय कर शबे अरबईन पर जैसे ही आप कर्बला पहुंचते हैं… कहा जाता है सारी थकान भूलकर आपकी नजरें उस गुंबद पर ठहर जाती हैं। बताने वाले कहते हैं आंखों से जारो कतार आंसू बहते हैं, अगर आप बचपन से शहादते मजलूम के बारे में पढ़ते और सुनते रहे हैं तो सारे मंजर नेत्रों के समक्ष जैसे उतर ही आते हैं।
