मुख्यपृष्ठस्तंभअंदर की बात: सफेद कोट की नाराजगी!

अंदर की बात: सफेद कोट की नाराजगी!

राजन पारकर

महाराष्ट्र की राजनीति इन दिनों तीन अलग-अलग घटनाओं के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई दे रही है। एक तरफ चिकित्सा जगत सरकार के एक प्रस्ताव के विरोध में सड़क पर है, दूसरी तरफ एक उभरते राजनीतिक चेहरे से मुलाकात ने सत्ता के गलियारों में बेचैनी बढ़ा दी है, तो तीसरी ओर छात्र आंदोलन और उस पर लग रहे आरोप-प्रत्यारोप ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है। मंत्रालय के बंद कमरों में चर्चा है कि आने वाले दिनों में केवल फैसले ही नहीं, कई चेहरों की भूमिका भी बदल सकती है। सवाल सिर्फ इतना है कि सत्ता जनता की आवाज सुनेगी या फिर हर विरोध को राजनीति का रंग देकर आगे बढ़ जाएगी?
इलाज कौन करेगा?
सरकारें अक्सर यह मान बैठती हैं कि डॉक्टर केवल ऑपरेशन थिएटर में आवाज उठाते हैं, सड़क पर नहीं। लेकिन जब सफेद कोट वाला वर्ग ही विरोध में उतर आए तो समझ लीजिए कि कहीं न कहीं नीति और जमीनी हकीकत के बीच की दूरी खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी है। सूत्रों के अनुसार, मंत्रालय में कई दौर की बैठकों के बावजूद इस विवाद को समय रहते सुलझाने की गंभीर कोशिश नहीं हुई। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि स्वास्थ्य विभाग के कुछ निर्णय अब सरकार के लिए ही सिरदर्द बनते जा रहे हैं। सवाल केवल एक कोर्स या एक रजिस्ट्रेशन का नहीं है। सवाल यह है कि चिकित्सा व्यवस्था का भविष्य वैज्ञानिक मानकों से चलेगा या राजनीतिक समीकरणों से। अगर डॉक्टर ऑपरेशन थिएटर छोड़कर आंदोलन में बैठने को मजबूर हो जाएं और मरीज अस्पतालों के चक्कर काटते रहें, तो जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी? सरकार को यह याद रखना चाहिए कि अस्पतालों में इलाज भरोसे से चलता है और भरोसा आदेशों से नहीं बनता। सत्ता यदि संवाद छोड़कर केवल सरकारी नोटिफिकेशन पर भरोसा करेगी तो मरीजों की पीड़ा का इलाज किसी दवा से नहीं होगा।
तीस साल का नेता या सत्ता की नई बेचैनी?
राजनीति में मुलाकातें कभी केवल चाय पर नहीं होतीं। हर मुलाकात के पीछे चर्चा, हर तस्वीर के पीछे संदेश और हर मुस्कान के पीछे कई सवाल छिपे होते हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि एक युवा चेहरे से हुई मुलाकात ने कई पुराने नेताओं की धड़कनें बढ़ा दी हैं। सूत्रों के अनुसार, सत्ता पक्ष के भीतर भी इस मुलाकात को लेकर अलग-अलग अर्थ निकाले जा रहे हैं। कोई इसे सामान्य शिष्टाचार बता रहा है तो कोई इसे आने वाले राजनीतिक समीकरणों की प्रस्तावना मान रहा है। यदि एक तीस वर्ष का नेता केवल शुभकामनाएं स्वीकार करने भर से सत्ता के गलियारों में हलचल पैदा कर दे, तो समझना चाहिए कि डर उम्र से नहीं, जनसमर्थन की संभावना से होता है। अंदर की बात यह है कि राजनीति में अक्सर विरोधी उतना खतरनाक नहीं होता जितना वह चेहरा, जो तेजी से चर्चा का केंद्र बनने लगे। मंत्रालय के बंद कमरों में भी यही सवाल घूम रहा है कि यह मुलाकात केवल औपचारिक थी या आने वाले राजनीतिक मौसम की पहली दस्तक।
हर आंदोलन को विदेशी साजिश बताने की बीमारी!
जब भी देश में कोई बड़ा आंदोलन खड़ा होता है, तब असली सवालों का जवाब देने के बजाय बहस को किसी दूसरे मोड़ पर ले जाने की पुरानी राजनीतिक कला फिर सक्रिय हो जाती है। सूत्रों के अनुसार, सत्ता और विपक्ष दोनों अपने-अपने राजनीतिक लाभ के हिसाब से इस आंदोलन की व्याख्या कर रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि छात्रों की वास्तविक समस्याओं पर चर्चा कम और आंदोलन की नीयत पर बहस ज्यादा हो रही है। यदि हर विरोध को बांग्लादेश, नेपाल या किसी विदेशी साजिश से जोड़ दिया जाएगा, तो फिर लोकतंत्र में असहमति की जगह कहां बचेगी? लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत सवाल पूछने का अधिकार है, न कि हर सवाल पूछने वाले को संदेह की नजर से देखना। अंदर की बात यह है कि जनता अब भाषणों से ज्यादा जवाब चाहती है। सरकार हो या विपक्ष, दोनों को यह समझना होगा कि युवाओं की आवाज को केवल राजनीतिक चश्मे से देखने की आदत अंतत: लोकतंत्र को ही कमजोर करती है।

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