शीतल अवस्थी
शिव आशुतोष यानी शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता हैं। इसलिए यह भी तय है कि इस स्वरूप का स्मरण जल्दी ही इच्छा पूरी कर सदा प्रसन्न रखता है। शिव के पूजन में फूलों का जितना महत्व है उतना ही महत्व विभिन्न प्रकार के जलाभिषेकों का भी है। शिव महापुराण में विभिन्न रसों से महादेव को जलाभिषेक कर पूजने का वर्णन विस्तारपूर्वक दिया गया है, जिससे साधक को कई रोगों से छुटकार मिल जाता है वहीं मन चाहे फल की प्राप्ति भी होती है। भगवान शिव को जलधारा अतिप्रिय है, इसीलिए शास्त्रों में बताया गया है कि जल व पंचामृतधारा से शिवजी का अभिषेक करने पर शिवजी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और विभिन्न कामनाओं की पूर्ति होती है। अभिषेक करते शिव मंत्र बोले जाते हैं। ॐ नम: शिवाय मंत्र का जप भी चमत्कारी फल प्रदान करता है। ज्वर (बुखार) से पीड़ित होने पर भगवान शिव को शुद्ध जल की जलधारा चढ़ाने से शीघ्रताशीघ्र लाभ मिलता है। सुख व संतान की वृद्धि के लिए भी जलधारा द्वारा शिव की पूजा उत्तम बताई गई है। घृत यानी घी की धारा से अभिषेक करने से वंश का विस्तार और रोगों पर दवाइयों का जल्द असर होता है। नपुंसक व्यक्ति अगर घी से शिव की पूजा करे व ब्राह्मणों को भोजन कराए तथा सोमवार का व्रत करे तो उसकी समस्या का निदान हो जाता है। तेज दिमाग के लिए शक्कर मिश्रित दूध से भगवान शिव का जलाभिषेक करना चाहिए। जल में दूध मिला कर अथवा केवल दूध से भी शिवजी का अभिषेक किया जाता है। दूध से अभिषेक करने पर विशेष फल प्राप्त होता है। कहते हैं भगवान शिव को दूध की धारा से अभिषेक करने से मूर्ख भी बुद्धिमान हो जाता है, घर की कलह शांत होती है। इसी तरह सुगंधित तेल से शिव का अभिषेक करने पर समृद्धि में वृद्धि होती है। भगवान शिव का ईख (गन्ना) के रस से अभिषेक करें तो सभी आनंदों की प्राप्ति होती है। शिव को गंगाजल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है। मधु (शहद) की धारा शिव पर चढ़ाने से टीबी रोग दूर हो जाता है।
धर्म ग्रंथों में भगवान शिव को विभिन्न प्रकार के अनाज अर्पित करने का भी विधान बताया गया है जो इस प्रकार है-
भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है।
तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाता है।
जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है।
भगवान शिव को गेंहू चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है।
यह सभी अन्न भगवान को अर्पण करने के पश्चात गरीबों में वितरित कर देना चाहिए।
उत्तरमुखी होकर करें शिवलिंग पूजन
सावन में शिवलिंग पूजा जीवन व मन से सारे कलह मिटाकर हर सुख देने वाली मानी गई है। हर देव पूजा के समान शिवलिंग पूजा में भी श्रद्धा और आस्था की अहमियत है। इसके साथ ही शास्त्रोक्त नियम व संयम के मुताबिक शिवलिंग पूजा जल्द शुभ फल देने वाली मानी गई है। इन नियमों में एक है शिवलिंग पूजा के समय भक्त के बैठने की दिशा। शिवलिंग से पूर्व दिशा की ओर नहीं बैठना चाहिए। क्योंकि यह दिशा भगवान शिव के आगे या सामने होती है और धार्मिक दृष्टि से देव मूर्ति या प्रतिमा का सामना या रोक ठीक नहीं मानी गई है। पूजा के दौरान शिवलिंग से पश्चिम दिशा की ओर नहीं बैठना चाहिए। क्योंकि वह भगवान शंकर की पीठ मानी जाती है। इसलिए पीछे से देवपूजा करना शुभ फल नहीं देती। शिवलिंग से उत्तर दिशा में भी न बैठे। क्योंकि माना जाता है कि इस दिशा में भगवान शंकर का बायां अंग होता है, जो शक्तिरुपा देवी उमा का स्थान है। इस तरह एक दिशा बचती है – वह है दक्षिण दिशा। इस दिशा में बैठकर पूजा फल और इच्छापूर्ति की दृष्टि से श्रेष्ठ मानी जाती है। सरल अर्थ में शिवलिंग के दक्षिण दिशा की ओर बैठकर यानी उत्तर दिशा की ओर मुख कर पूजा और अभिषेक शीघ्र फल देने वाला माना गया है। इसलिए उज्जैन के दक्षिणामुखी महाकाल और अन्य दक्षिणमुखी शिवलिंग पूजा का बहुत धार्मिक महत्व है। शिवलिंग पूजा में सही दिशा में बैठक के साथ ही भक्त को भस्म का त्रिपुण्ड़ लगाना, रुद्राक्ष की माला पहनना और बिल्वपत्र अवश्य चढ़ाना चाहिए। अगर भस्म उपलब्ध न हो तो मिट्टी से भी मस्तक पर त्रिपुण्ड़ लगाने का विधान शास्त्रों में बताया गया है।
