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फलसफा: ५,१०० से पूरी नहीं होती जिम्मेदारी- बुजुर्गों के अकेलेपन पर समाज के लिए एक चेतावनी

सना खान

हरियाणा के सोनीपत से सामने आई एक घटना ने समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया है। सोशल मीडिया पर वायरल जानकारी के अनुसार, ७४ वर्षीय शिवचरण गुप्ता वृद्धाश्रम में अपने अंतिम समय तक अपनी तीनों बेटियों का इंतजार करते रहे। वृद्धाश्रम प्रबंधन का दावा है कि परिवार को उनकी गंभीर स्थिति की सूचना दी गई थी, लेकिन कोई मिलने नहीं आया। मृत्यु के बाद कथित तौर पर केवल ५,१०० रुपए ऑनलाइन भेजे गए और अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी भी वृद्धाश्रम ने निभाई। हालांकि, इस घटना की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अभी होना बाकी है।
यह घटना एक बड़ा सवाल छोड़ती है, क्या तेज रफ्तार जीवन और बदलते पारिवारिक ढांचे में रिश्ते केवल औपचारिक होकर रह गए हैं? माता-पिता को केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि समय, सम्मान और भावनात्मक साथ भी चाहिए। यह संदेश महाराष्ट्र सहित पूरे देश के लिए समान रूप से प्रासंगिक है। मुंबई, पुणे, ठाणे और नवी मुंबई जैसे शहरों में बड़ी संख्या में वरिष्ठ नागरिक अकेले रह रहे हैं। सरकारी योजनाएं और वृद्धाश्रम आवश्यक हैं, लेकिन वे परिवार के स्नेह का स्थान नहीं ले सकते।
माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम-२००७ संतान पर माता-पिता के भरण-पोषण की कानूनी जिम्मेदारी तय करता है, लेकिन अपनापन किसी कानून से नहीं, बल्कि संस्कारों और संवेदनशीलता से आता है। सोनीपत की यह घटना केवल एक वायरल पोस्ट नहीं, बल्कि समाज के लिए चेतावनी है। विकास तभी सार्थक है, जब उसमें अपने बुजुर्गों के लिए समय, सम्मान और संवेदना भी शामिल हो। यदि परिवारों में संवाद और अपनापन कम होता गया, तो वृद्धाश्रम बढ़ेंगे, लेकिन रिश्तों की गर्माहट नहीं।

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