अरुण कुमार गुप्ता
कभी देशभर की सड़कों और हाईवे को २०२४ तक अमेरिका की सड़कों और हाईवे जैसे बनाने का दावा करने वाले ‘गड्ढा’ करी के दावों की पोल हर रोज खुल रही है। यही नहीं, पेट्रोल में इथेनॉल की मिलावट की बात हो तो वे अब कह रहे हैं कि ई-२० से पेट नहीं भरा है। अब ई-२७ इथेनॉल की टेस्टिंग चल रही है। ब्राजील का उदाहरण देते हुए ’गड्ढा’ करी कहते हैं कि वहां ई-२७ वाला पेट्रोल बेचा जा रहा है, लेकिन जब पेट्रोल की कीमत कम करने की बात होती है तो सीधे पल्ला झाड़ते हुए कहते हैं कि यह मामला पेट्रोलियम मंत्रालय का है। तो ’गड्ढा’ करी जी यह बताइए कि एथेनॉल का मामला आपके मंत्रालय का है और कीमत पेट्रोलियम मंत्रालय का मामला है। आखिर गड्ढा करी को इथेनॉल से इतना प्रेम क्यों है। जबकि इथेनॉल शुद्ध पेट्रोल से महंगा पड़ता है। आयातित पेट्रोल की कीमत ५० से ५५ रुपए प्रति लीटर पड़ती है, वहीं इथेनॉल की कीमत ७० रुपए प्रति लीटर से ज्यादा पड़ती है, तो फिर इथेनॉल की जरूरत क्यों है। लोगों की गाड़ियों को कबाड़ा करने का ठेका भी आपको मिल गया है क्या। जो आप पुत्र मोह में लोगों की जेब काटने से भी नहीं हिचक रहे हैं। ऊपर से आवाज उठाने वालों को कोर्ट में घसीटने की धमकी दे रहे हैं। अब ’गड्ढा’ करी की एक और पोल जो खुली है हाईवे को लेकर। २०२४ तक अमेरिका जैसी सड़कें और हाईवे का दावा करने वाले ’गड्ढा’ करी के मंत्रालय के ही अधीन आने वाले कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे का १३ जुलाई को उद्घाटन हुआ और उद्घाटन के महज २२ दिनों में ही आठ जगह हाईवे धंस गया। ४,२०० करोड़ की लागत से ६३ किलोमीटर लंबे बने इस एक्सप्रेसवे का प्रति किलोमीटर खर्च निकालें तो ६७ करोड़ रुपए बैठता है यानी १ किलोमीटर हाईवे बनाने में ६७ करोड़ खर्च। लेकिन यह हाईवे ६७ दिन भी सही सलामत नहीं रहा। अब ’गड्ढा’ करी इसकी जिम्मेदारी भी किसी दूसरे मंत्रालय पर डाल दीजिए।
अब तो ज्ञानेश कुमार भी गए!
भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली पर विपक्षी पार्टियां ही नहीं, एसआईआर के दौरान प्रताड़ित देश के आम लोग सवाल खड़े करते आए हैं। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को कॉकरोचों के कारण कुर्सी छोड़नी पड़ी। अब इन कॉकरोचों ने चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हुंकार भरी है। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने चुनाव आयोग और चुनाव आयुक्त की अकाउंटबिलिटी पर सवाल खड़ा करते हुए कहा है कि हमारे देश की संवैधानिक संस्थाएं बहुत खतरनाक स्थिति में आ गई हैं। सभी संवैधानिक संस्थाओं खासकर चुनाव आयोग पर जनता का भरोसा कम होते जा रहा है। लोगों में नाराजगी बढ़ रही है। यदि राजनीति की बात करें तो नेता सुबह एक पार्टी से चुनाव जीतता है शाम को दूसरी पार्टी में चला जाता है। सुबह जनता किसी एक सरकार के लिए मतदान करती है और शाम को कोई और सरकार बन जाती है। जब यह सब नहीं हो पता है तो ईडी, सीबीआई भेज कर पार्टियों को तोड़ा जाता है। ऐसे पोलिटिकल सिस्टम से लोगों का भरोसा उठते जा रहा है। यदि ऐसा चलता रहा तो यह देश के लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा है। यदि चुनाव आयोग की बात करते हैं तो पहले मतदाता सरकार चुनता था। आज सरकार चुन रही है कि वोटर कौन होगा। कौन वोट डालेगा, कौन नहीं डालेगा। अभिजीत दीपके कहते हैं कि वह चुनाव आयोग के खिलाफ अभियान छेड़ने वाले हैं। ऐसे में अब यही कहा जा सकता है कि धर्मेंद्र प्रधान के बाद ज्ञानेश कुमार की भी उलटी गिनती शुरू हो गई है।
